संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ संस्कारविधिः आचमन करके पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे घृत की आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार, नवमी स्विष्टकृत् आज्याहुति एक, अर्थात् दिशाओं की द्वारस्थ वेदियों में अग्न्याधान से लेके स्विष्टकृत् आहुतिपर्यन्त विधि करके, पश्चात् पूर्वदिशा द्वारस्थ कुण्ड में— ओं प्राच्या॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओम् दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इन दो मन्त्रों से पूर्व द्वारस्थ वेदी में दो घृताहुति देवे। वैसे ही— ओं दक्षि॑णाया दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इन दो मन्त्रों से दक्षिण द्वारस्थ वेदी में एक-एक मन्त्र करके दो आज्याहुति और— ओं प्र॒तीच्या॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इन दो मन्त्रों से दो आज्याहुति पश्चिम दिशा द्वारस्थ कुण्ड में देवे। ओं उदी॑च्या दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इनसे उत्तर दिशास्थ वेदी में दो आज्याहुति देवे। पुनः मध्यशालास्थ वेदी के समीप जाके स्व-स्व दिशा में बैठके— ओं ध्रुवाया॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इनसे मध्य वेदी में दो आज्याहुति।