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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 240

२३६ संस्कारविधिः अमी॒वहा वास्तोष्पते॒ विश्वा॑ रू॒पाण्या॒विश॑न् । सखा॑ सु॒शेव॑ एधि न॒ः स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ —ऋ० मं० ७ । सू० ५५ । मं० १ ॥ इन चार मन्त्रों से चार आज्याहुति देके, जो स्थालीपाक, अर्थात् भात बनाया हो, उसे दूसरे कांसे के पात्र में लेके, उसपर यथायोग्य घृत सेचन करके अपने-अपने सामने रक्खें और पृथक्-पृथक् थोड़ा-थोड़ा लेकर— ओम् अग्निमिन्द्रं बृहस्पतिं विश्वाँश्च देवानुपह्वये । सरस्वतीञ्च वाजीञ्च वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ १ ॥ सर्पदेवजनान्सर्वान् हिमवन्तः सुदर्शनम् । वसूँश्च रुद्रानादित्यानीशानं जगदैः सह । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ २ ॥ पूर्वाह्नमपराह्रं चोभौ मध्यन्दिना सह । प्रदोषमर्धरात्रं च व्युष्टां देवीं महापथाम् । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ ३ ॥ ओं कर्तारञ्च विकर्तारं विश्वकर्माणमोषधींश्च वनस्पतीन् । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ ४ ॥ धातारं च विधातारं निधीनां च पतिः सह । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु में दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ ५ ॥ स्योनः शिवमिदं वास्तु दत्तं ब्रह्मप्रजापती । सर्वांश्च देवताश्च स्वाहा ॥ ६ ॥ स्थालीपाक, अर्थात् घृतयुक्त भात की इन छह मन्त्रों से छह आहुति देकर कांस्यपात्र में उदुम्बर=गूलर और पलाश के पत्ते, शाड्वल=तृणविशेष, गोमय, दही, मधु, घृत, कुशा और यव को लेके उन सब वस्तुओं को मिलाकर— ओं श्रीश्च त्वा यशश्च पूर्वे सन्धौ गोपायेताम्। इस मन्त्र से पूर्व द्वार।