संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २४५ श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यङ् निबद्धं स्वेषु कर्मसु । धर्ममूलं निषेवेत सदाचारमतन्द्रितः ॥ ११ ॥ आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः । आचाराद् धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १२ ॥ दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः । दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ १३ ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान् नरः । श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १४ ॥ अर्थ:—सदा विद्यावृद्धों और वयोवृद्धों को 'नमस्ते', अर्थात् उनका मान्य किया क़रे। जब वे अपने समीप आवें तब उठकर मान्यपूर्वक ला अपने आसन पर बैठावे और हाथ जोड़के आप उनके समीप बैठे उनसे प्रश्न पूछे और वे उत्तर देवें और जब वे जानें लगें तब थोड़ी दूर पीछे-पीछे जाकर 'नमस्ते' कर विदा किया करे और वृद्ध लोग हर बार निक़म्मे जहाँ-तहाँ न जाया करें ॥ १० ॥ गृहस्थ सदा आलस्य को छोड़कर वेद और मनुस्मृति में वेदानुकूल कहे हुए अपने कर्मों में निबद्ध और धर्म का मूल सदाचार, अर्थात् सत्य और सत्पुरुष, आप्त, धर्मात्माओं का जो आचरण है, उसका सेवन सदा किया करें ॥ ११ ॥ मनुष्य धर्माचरण ही से दीर्घायु, उत्तम प्रजा और अक्षय धन को प्राप्त होता है तथा धर्माचार बुरे, अधर्मयुक्त लक्षणों का नाश कर देता है ॥ १२ ॥ जो दुष्टाचारी होता है, वह सर्वत्र निन्दित, दुःखभागी और व्याधि से सदा अल्पायु हो जाता है ॥ १३ ॥ जो सब अच्छे लक्षणों से हीन होकर भी सदाचारयुक्त, सत्य में श्रद्धावान् और निन्दा आदि दोषरहित होता है, वह सुख से सौ वर्षपर्यन्त जाता है ॥ १४ ॥