संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
गृहाश्रमप्रकरणम् २४५ श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यङ् निबद्धं स्वेषु कर्मसु । धर्ममूलं निषेवेत सदाचारमतन्द्रितः ॥ ११ ॥ आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः । आचाराद् धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १२ ॥ दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः । दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ १३ ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान् नरः । श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १४ ॥ अर्थ:—सदा विद्यावृद्धों और वयोवृद्धों को 'नमस्ते', अर्थात् उनका मान्य किया क़रे। जब वे अपने समीप आवें तब उठकर मान्यपूर्वक ला अपने आसन पर बैठावे और हाथ जोड़के आप उनके समीप बैठे उनसे प्रश्न पूछे और वे उत्तर देवें और जब वे जानें लगें तब थोड़ी दूर पीछे-पीछे जाकर 'नमस्ते' कर विदा किया करे और वृद्ध लोग हर बार निक़म्मे जहाँ-तहाँ न जाया करें ॥ १० ॥ गृहस्थ सदा आलस्य को छोड़कर वेद और मनुस्मृति में वेदानुकूल कहे हुए अपने कर्मों में निबद्ध और धर्म का मूल सदाचार, अर्थात् सत्य और सत्पुरुष, आप्त, धर्मात्माओं का जो आचरण है, उसका सेवन सदा किया करें ॥ ११ ॥ मनुष्य धर्माचरण ही से दीर्घायु, उत्तम प्रजा और अक्षय धन को प्राप्त होता है तथा धर्माचार बुरे, अधर्मयुक्त लक्षणों का नाश कर देता है ॥ १२ ॥ जो दुष्टाचारी होता है, वह सर्वत्र निन्दित, दुःखभागी और व्याधि से सदा अल्पायु हो जाता है ॥ १३ ॥ जो सब अच्छे लक्षणों से हीन होकर भी सदाचारयुक्त, सत्य में श्रद्धावान् और निन्दा आदि दोषरहित होता है, वह सुख से सौ वर्षपर्यन्त जाता है ॥ १४ ॥
२४६ संस्कारविधिः यद्यत् परवशं कर्म तत्तद् यत्नेन वर्जयेत्। यद्यदात्मवशं तु स्यात् तत्तत् सेवेत यत्नतः॥ १५॥ सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥ १६॥ अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम्। हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते॥ १७॥ अर्थः—मनुष्य जो-जो पराधीन कर्म हो उस-उसको प्रयल से सदा छोड़े और जो-जो स्वाधीन कर्म हो उस-उसका सेवन प्रयल से किया करे॥ १५॥ क्योंकि जितना परवश होना है वह सब दुःख और जितना स्वाधीन रहना है, वह सब सुख कहाता है। यही संक्षेप से सुख और दुःख का लक्षण जानो॥ १६॥ जो अधार्मिक मनुष्य है और जिसका अधर्म से सञ्चित किया हुआ धन है और जो सदा हिंसा में, अर्थात् वैर में प्रवृत्त रहता है, वह इस लोक और परलोक, अर्थात् परजन्म में सुख को प्राप्त कभी नहीं हो सकता॥ १७॥ नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव। शनैरावर्त्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति॥ १८॥ यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पुत्रेषु नप्तृसु। न त्वेवन्तु कृतोऽधर्मः कर्त्तुर्भवति निष्फलः॥ १९॥ सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत् सदा। शिष्याँश्च शिष्याद् धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः॥ २०॥ अर्थः—मनुष्य निश्चय करके जाने कि इस संसार में जैसे गाय की सेवा का फल दूध आदि शीघ्र नहीं होता, वैसे ही किये हुए अधर्म का फल भी शीघ्र नहीं होता, किन्तु धीरे- धीरे अधर्म कर्त्ता के सुखों को रोकता हुआ सुख के मूलों को काट देता है। पश्चात् अधर्मी दुःख-ही-दुःख भोगता है॥ १८॥
गृहाश्रमप्रकरणम् २४७ यदि अधर्म का फल कर्त्ता की विद्यमानता में न हो तो पुत्रों और पुत्रों के समय में न हो तो नातियों के समय में अवश्य प्राप्त होता है, किन्तु यह कभी नहीं हो सकता कि कर्त्ता का किया हुआ कर्म निष्फल होवे ॥ १९॥ इसलिए मनुष्यों को योग्य है कि सत्य, धर्म और आर्य, अर्थात् उत्तम पुरुषों के आचरणों और भीतर-बाहर की पवित्रता में सदा रमण करें। अपनी वाणी, बाहू, उदर को नियम और सत्यधर्म के साथ वर्त्तमान रखके शिष्यों को सदा शिक्षा किया करें ॥ २० ॥ परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ । धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च ॥ २१ ॥ धर्मं शनैस्सञ्चिनुयाद् वल्मीकमिव पुत्तिकाः । परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ २२ ॥ उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं सम्बन्धानाचरेत् सह । निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमाँस्त्यजेत् ॥ २३ ॥ वाच्यार्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तान्तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २४ ॥ स्वाध्यायेन जपैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः । महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ २५ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—जो धर्म से वर्जित धनादि पदार्थ और काम हों, उन्हें सर्वथा शीघ्र छोड़ देवे और जो धर्माभास, अर्थात् उत्तरकाल में दुःखदायक कर्म हैं और जो लोगों को निन्दित कर्म में प्रवृत्त करनेवाले कर्म हैं, उनसे भी दूर रहे ॥ २१ ॥ जैसे दीमक धीरे-धीरे बड़े भारी घर को बना लेती है, वैसे मनुष्य परजन्म के सहाय के लिए सब प्राणियों को पीड़ा
२४८ संस्कारविधिः न देकर धर्म का सञ्चय धीरे-धीरे किया करे ॥ २ ॥ जो मनुष्य अपने कुल को उत्तम करना चाहे, वह नीच- नीच पुरुषों का सम्बन्ध छोड़कर नित्य अच्छे-अच्छे पुरुषों से सम्बन्ध बढ़ाता जावे ॥ २३ ॥ जिस वाणी में सब व्यवहार निश्चित, वाणी ही जिनका मूल और जिस वाणी ही से सब व्यवहार सिद्ध होते हैं, जो मनुष्य उस वाणी को चोरता, अर्थात् मिथ्याभाषण करता है, वह जानो सब चोरी आदि पाप ही को करता है। इसलिए मिथ्याभाषण को छोड़के सदा सत्यभाषण ही किया करे ॥ २४ ॥ मनुष्यों को चाहिए कि धर्म से वेदादि शास्त्रों का पठन- पाठन, गायत्री-प्रणवादि का अर्थविचार, ध्यान, अग्निहोत्रादि होम, कर्मोपासना, ज्ञान=विद्या, पौर्णमास्यादि इष्टि, पञ्चमहायज्ञ, अग्निष्टोम आदि, न्याय से राज्यपालन, सत्योपदेश और योगाभ्यासादि उत्तम कर्मों से इस शरीर को ब्राह्मी, अर्थात् ब्रह्मसम्बन्धी करें ॥ २५ ॥ अथ सभास्वरूप लक्षणम्—जो-जो विशेष बड़े-बड़े काम हों जैसाकि राज्य, वे सब सभा से निश्चय करके किये जावें। इसमें प्रमाण— तं सभा॑ च॒ समि॑तिश्च॒ सेना॑ च॒ ॥ १ ॥ —अथर्व० कां० १५। सू० ९। मं० २॥ सभ्य॑ स॒भां मे॑ पाहि॒ ये च॒ सभ्या॑ः सभासद॑ः ॥ २ ॥ —अथर्व० कां० १९। सू० ५५। मं० ६॥ त्रीणि॑ राजाना वि॒दथे॑ पु॒रूणि॒ परि॑ वि॒श्वा॑नि भूषथः सदां॑सि ॥ ३ ॥ —ऋ० मं० ३। सू० ३८। मं० ६॥ अर्थ- (तम्) जोकि संसार में धर्म के साथ राज्यपालनादि किया जाता है, उस व्यवहार को सभा और संग्राम तथा सेना सब प्रकार सञ्चित करे ॥ १ ॥
गृहाश्रमप्रकरणम् २४९ हे सभ्य सभा के योग्य सभापते राजन्! तू (मे) मेरी (सभाम्) सभी की (पाहि) रक्षा और उन्नति किया कर। (ये च) और जो (सभ्याः) सभा के योग्य धार्मिक, आप्त (सभासदः) सभासद्, विद्वान् लोग हैं वे भी सभा की योजना, रक्षा और उससे सबकी उन्नति किया करें॥२॥ जो (राजाना) राजा और प्रजा के भद्र पुरुषों के दोनों समुदाय हैं, वे (विदथे) उत्तम ज्ञान और लाभदायक इस जगत् अथवा संग्रामादि कार्यों में (त्रीणि) राजसभा, धर्मसभा और विद्यासभा, अर्थात् विद्यादि व्यवहारों की वृद्धि के लिए ये तीन प्रकार की (सदांसि) सभा नियत करें। इन्हीं से संसार की सब प्रकार उन्नति करें॥३॥ अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत्। यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुस्स धर्मः स्यादशङ्कितः॥१॥ धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिबृंहणः। ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः॥२॥ अर्थः—हे गृहस्थ लोगो! जो धर्मयुक्त व्यवहार मनुस्मृति आदि में प्रत्यक्ष न कहे हों यदि उनमें शङ्का होवे तो तुम जिसको शिष्ट, आप्त विद्वान् कहें, उसी को शङ्कारहित कर्त्तव्य धर्म मानो॥१॥ शिष्ट सब मनुष्यमात्र नहीं होते, किन्तु जिन्होंने पूर्ण ब्रह्मचर्य और धर्म से साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़ें हों, जो श्रुतिप्रमाण और प्रत्यक्षादि प्रमाणों ही से विधि वा निषेध करने में समर्थ, धार्मिक, परोपकारी हों, वे ही शिष्ट पुरुष होते हैं॥२॥ दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत्। त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत्॥३॥ त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः। त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत् स्याद् दशावरा॥४॥
२५० संस्कारविधिः ऋग्वेदविद् यजुर्विच्च सामवेदविदेव च। त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये॥५॥ एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद् द्विजोत्तमः। स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः॥६॥ अर्थ:—वैसे शिष्ट न्यून-से-न्यून दश पुरुषों की सभा होवे, अथवा बड़े विद्वान् तीनों की भी सभा हो सकती है। जो सभा से धर्म-कर्म निश्चित हों, उनका भी आचरण सब लोग करें॥३॥ • उन दशों में इस प्रकार के विद्वान् होवें—तीन वेदों के विद्वान्, चौथा हेतुक, अर्थात् कारण-अकारण का ज्ञाता, पाँचवाँ तर्की= न्यायशास्त्रवित्, छठा निरुक्त का जाननेवाला, सातवाँ धर्मशास्त्रवित्, आठवाँ ब्रह्मचारी, नववाँ गृहस्थ और दशवाँ वानप्रस्थ—इन महात्माओं की सभा होवे॥४॥ तथा ऋग्वेदवित्, यजुर्वेदवित् और सामवेदवित् इन तीनों विद्वानों की भी सभा धर्मसंशय, अर्थात् सब व्यवहारों के निर्णय के लिए होनी चाहिए और जितने सभा में अधिक पुरुष हों, उतनी ही उत्तमता है॥५॥ द्विजों में उत्तम, अर्थात् चतुर्थाश्रमी संन्यासी अकेला भी जिस धर्मव्यवहार के करने का निश्चय करे, वही कर्त्तव्य परमधर्म समझना, किन्तु अज्ञानियों के सहस्रों, लाखों और करोड़ों पुरुषों का कहा हुआ धर्मव्यवहार कभी न मानना चाहिए, किन्तु धर्मात्मा विद्वानों और विशेष परमविद्वान् संन्यासी का वेदादि प्रमाणों से कहा हुआ धर्म सबको मानने योग्य है॥६॥ यदि सभा में मतभेद हो तो बहुपक्षानुसार मानना और समपक्ष में उत्तमों की बात स्वीकार करनी और दोनों पक्षवाले बराबर उत्तम हों तो वहाँ संन्यासियों की सम्मति लेनी। जिधर पक्षपातरहित सर्वहितैषी संन्यासियों की सम्मति होवे, वही उत्तम
गृहाश्रमप्रकरणम् २५१ समझनी चाहिए। चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिभिर्द्विजैः। दशलक्षणको धर्मस्सेवितव्यः प्रयत्नतः॥७॥ धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥८॥ —मनु०॥ अर्थ—ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी आदि सब मनुष्यों को योग्य है कि निम्नलिखित धर्म का सेवन और उससे विरुद्ध अधर्म का त्याग प्रयत्न से किया करें॥७॥ धर्म नाम न्याय—पक्षपात छोड़कर सत्य ही का आचरण और असत्य का सर्वदा परित्याग रखना। इस धर्म के ग्यारह लक्षण हैं (अहिंसा) किसी से वैर-बुद्धि करके उसके अनिष्ट करने में कभी न वर्तना। (धृतिः) सुख-दुःख, हानि-लाभ में भी व्याकुल होकर धर्म को न छोड़ना, किन्तु धैर्य से धर्म ही में स्थिर रहना। (क्षमा) निन्दा-स्तुति, मानापमान का सहन करके धर्म ही करना। (दमः) मन को अधर्म से सदा हटाकर धर्म ही में प्रवृत्त रखना। (अस्तेयम्) मन-कर्म-वचन से अन्याय और अधर्म से पराये द्रव्य का स्वीकार न करना। (शौचम्) राग-द्वेषादि त्याग से आत्मा और मन को पवित्र और जलादि से शरीर को शुद्ध रखना। (इन्द्रियनिग्रहः) श्रोत्रादि बाह्य इन्द्रियों को अधर्म से हटाके धर्म में ही चलाना। (धीः) वेदादि सत्यविद्या, ब्रह्मचर्य, सत्सङ्ग करने और कुसङ्ग, दुर्व्यसन, मद्यपानादि त्याग से बुद्धि को सदा बढ़ाते रहना। (विद्या) जिससे भूमि से लेके परमेश्वरपर्यन्त का यथार्थ बोध होता है, उस विद्या को प्राप्त होना। (सत्यम्) सत्य मानना, सत्य बोलना, सत्य करना। (अक्रोधः) क्रोधादि दोषों को छोड़कर शान्त्यादि गुणों का ग्रहण करना धर्म कहाता है, इसका ग्रहण और अन्याय—पक्षपात-सहित आचरण अधर्म, जोकि हिंसा=वैर-
२५२ संस्कारविधिः बुद्धि, अधैर्य, असहन, मन को अधर्म में चलाना, चोरी करना, अपवित्र रहना, इन्द्रियों को न जीतकर अधर्म में चलाना, कुसङ्ग, दुर्व्यसन, मद्यपानादि से बुद्धि का नाश करना, अविद्या जोकि अधर्माचरण, अज्ञान है उसमें फँसना, असत्य मानना, असत्य बोलना, क्रोधादि दोषों में फँसकर अधर्मी, दुष्टाचारी होना, ये ग्यारह अधर्म के लक्षण हैं। इनसे सदा दूर रहना चाहिए॥८॥ न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्। नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति न तत् सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम् ॥९॥ —महाभारते० सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम्। अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्बिषी ॥१०॥ धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते। शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥११॥ विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः। हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत ॥१२॥ अर्थ—वह सभा नहीं है, जिसमें वृद्ध पुरुष न होवें। वे वृद्ध नहीं हैं जो धर्म ही की बात नहीं बोलते। वह धर्म नहीं है, जिसमें सत्य नहीं और न वह सत्य है जोकि छल से युक्त हो ॥९॥ मनुष्य को योग्य है कि सभा में प्रवेश न करे। यदि सभा में प्रवेश करे तो सत्य ही बोले। यदि सभा में बैठा हुआ भी असत्य बात को सुनके मौन रहे, अथवा सत्य के विरुद्ध बोले, वह मनुष्य अतिपापी है॥१०॥ अधर्म से धर्म घायल होकर जिस सभा में प्राप्त होवे उसके घाव को यदि सभासद् न पूर देवें तो निश्चय जानो कि उस सभा में सब सभासद् ही घायल पड़े हैं॥११॥
गृहाश्रमप्रकरणम् २५३ जिसको सत्पुरुष, राग-द्वेष-रहित विद्वान् अपने हृदय से अनुकूल जानकर सेवन करते हैं, उसी पूर्वोक्त को तुम लोग धर्म जानो ॥ १२ ॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ १३ ॥ वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम्। वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद् धर्मं न लोपयेत् ॥ १४॥ अर्थ—जो पुरुष धर्म का नाश करता है उसी का नाश धर्म कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमें भी न मार डाले, इस भय से धर्म का हनन, अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए ॥ १३ ॥ जो सुख की वृष्टि करनेवाला, सब ऐश्वर्य का दाता धर्म है, उसका जो लोप करता है, उसको विद्वान् लोग वृषल, अर्थात् नीच समझते हैं, इसलिए किसी मनुष्य को धर्म का लोप करना उचित नहीं ॥ १४ ॥ न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः। धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥ १५ ॥ —महाभारते ॥ यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च। हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ १६ ॥ —मनु० ॥ निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीस्समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्। अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ॥ १७ ॥ —भर्तृहरिः॥
२५४ संस्कारविधिः अर्थ—मनुष्यों को योग्य है कि काम से, अर्थात् झूठ से कामना सिद्ध होने के कारण से वा निन्दा-स्तुति आदि के भय से भी धर्म का त्याग कभी न करें और न लोभ से। चाहे झूठ, अधर्म से चक्रवर्ती राज्य भी मिलता हो तथापि धर्म को छोड़कर चक्रवर्ती राज्य को भी ग्रहण न करें। चाहे भोजन-छादन, जल- पान आदि की जीविका भी अधर्म से हो सके वा प्राण जाते हों, परन्तु जीविका के लिए भी धर्म को कभी न छोड़ें, क्योंकि जीव और धर्म नित्य हैं तथा सुख-दुःख दोनों अनित्य हैं। अनित्य के लिए नित्य का छोड़ना अतीव दुष्ट कर्म है। इस धर्म का हेतु कि जिस शरीर आदि से धर्म होता है, वह भी अनित्य है। धन्य वे मनुष्य हैं जो अनित्य शरीर और सुख-दुःखादि के व्यवहार में वर्त्तमान होकर नित्य धर्म का त्याग कभी नहीं करते हैं॥१५॥ जिस सभा में बैठे हुए सभासदों के सामने अधर्म से धर्म और झूठ से सत्य का हनन होता है, उस सभा में सब सभासद् मरे-से ही हैं॥१६॥ सब मनुष्यों को यह निश्चय जानना चाहिए कि चाहे सांसारिक अपने प्रयोजन की नीति में वर्त्तनेहारे चतुर पुरुष निन्दा करें वा स्तुति करें, लक्ष्मी प्राप्त होवे, अथवा नष्ट हो जावे, आज ही मरण होवे, अथवा वर्षान्तर में मृत्यु प्राप्त होवे तथापि जो मनुष्य धर्मयुक्त मार्ग से एक पग भी विरुद्ध नहीं चलते वे ही धीर पुरुष धन्य हैं॥१७॥ सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒ सं वो॒ मनां॑सि जानताम्। दे॒वा भा॒गं यथा॒ पूर्वे॑ संजाना॒ना उ॒पास॑ते ॥१॥ —ऋ० म० १०। सू० १९१। मं० २॥ दृष्ट्वा रू॒पे व्याक॑रोत् स॒त्यानृ॒ते प्र॒जाप॑तिः। अश्र॑द्धामनृ॒तेऽद॑धाच्छ्र॒द्धां स॒त्ये प्र॒जाप॑तिः॥२॥ —यजु० अ० १९। मं० ७७॥
गृहाश्रमप्रकरणम् २५५ सह॒ नाव॑वतु सह॒ नौ॑ भुनक्तु सह॒ वीर्यं॑ करवावहै। तेज॒स्वि नावधी॑तमस्तु॒ मा वि॑द्विषावहै॑ । ओं शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः ॥ ३ ॥ —तै० आर० अष्टमप्रपाठकः। प्रथमानुवाकः ॥ अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो ! तुमको मैं ईश्वर आज्ञा देता हूँ कि (यथा) जैसे (पूर्वे) प्रथम अधीतविद्या, योगाभ्यासी, (संजानानाः) सम्यक् जाननेवाले, (देवाः) विद्वान् लोग मिलके (भागम्) सत्य-असत्य का निर्णय करके असत्य को छोड़ सत्य की (उपासते) उपासना करते हैं, वैसे (सं जानताम्) आत्मा से धर्माऽधर्म, प्रियाऽप्रिय को सम्यक् जाननेवाले (वः) तुम्हारे (मनांसि) मन एक-दूसरे से अविरोधी होकर एक पूर्वोक्त धर्म में सम्मत होवें और तुम उसी धर्म को (संगच्छध्वम्) सम्यक् मिलके प्राप्त होओ, जिसमें तुम्हारी एक सम्मति होती है और विरुद्धवाद, अधर्म को छोड़के (संवदध्वम्) सम्यक् संवाद प्रश्नोत्तर प्रीति से करके एक-दूसरे की उन्नति किया करो ॥ १ ॥ (प्रजापतिः) सकल सृष्टि की उत्पत्ति और पालन करनेवाला, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, न्यायकारी, अद्वितीय स्वामी परमात्मा (सत्यानृते) सत्य और अनृत (रूपे) भिन्न-भिन्न स्वरूपवाले धर्म-अधर्म को (दृष्ट्वा) अपनी सर्वज्ञता से यथावत् देखके (व्याकरोत्) भिन्न-भिन्न निश्चित करता है। (अनृते) मिथ्या- भाषणादि अधर्म में (अश्रद्धाम्) अप्रीति को और (प्रजापतिः) वही परमात्मा (सत्ये) सत्यभाषणादिलक्षणयुक्त न्याय, पक्षपातरहित धर्म में तुम्हारी (श्रद्धाम्) प्रीति को (अदधात्) धारण कराता है, वैसा ही तुम करो ॥ २ ॥ हम स्त्री-पुरुष, सेवक-स्वामी, मित्र-मित्र, पिता-पुत्रादि (सह) मिलके (नौ) हम दोनों प्रीति से (अवतु) एक-दूसरे की रक्षा किया करें और (सह) प्रीति से मिलके एक-दूसरे
२५६ संस्कारविधिः के (वीर्यम्) पराक्रम की बढ़ती (करवावहै) सदा किया करें। (नौ) हमारा (अधीतम्) पढ़ा-पढ़ाया (तेजस्वि) अतिप्रकाशमान (अस्तु) होवे और हम एक-दूसरे से (मा विद्विषावहै) कभी विद्वेष, विरोध न करें, किन्तु सदा मित्रभाव और एक-दूसरे के साथ सत्य प्रेम से वर्त्तकर सब गृहस्थों के सद्व्यवहारों को बढ़ाते हुए सदा आनन्द में बढ़ते जावें। जिस परमात्मा का यह 'ओम्' नाम है, उसकी कृपा और अपने धर्मयुक्त पुरुषार्थ से हमारे शरीर, मन और आत्मा का त्रिविध दुःख, जोकि अपने और दूसरे से होता है, नष्ट हो जावे और हम लोग प्रीति से एक-दूसरे के साथ वर्त्तके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि में सफल होके सदैव स्वयं आनन्द में रहकर सबको आनन्द में रक्खें ॥३॥ ॥ इति गृहाश्रमसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
15 अथ वानप्रस्थसंस्कारविधिं वक्ष्यामः 'वानप्रस्थ-संस्कार' उसे कहते हैं—जो विवाह से सन्तानोत्पत्ति करके पूर्ण ब्रह्मचर्य से पुत्र भी विवाह करे और पुत्र का भी एक सन्तान हो जाए, अर्थात् जब पुत्र का भी पुत्र हो जावे, तब पुरुष वानप्रस्थाश्रम, अर्थात् वन में जाकर निम्नलिखित सब बातें करे। अत्र प्रमाणानि ब्रह्मचर्याश्रमं समाप्य गृही भवेद् गृही भूत्वा वनी भवेद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत् ॥ १ ॥ —शतपथब्राह्मणे ॥ व्र॒तेन॑ दी॒क्षाम॑प्नोति दी॒क्षया॑प्नोति॒ दक्षि॑णाम्। दक्षि॑णा श्र॒द्धाम॑प्नोति श्र॒द्धया॑ स॒त्यमा॑प्यते ॥ २ ॥ —यजुः० अ० १९। मं० ३० ॥ अर्थ—मनुष्यों को चाहिए कि ब्रह्मचर्याश्रम की समाप्ति करके गृहस्थ होवें। गृहस्थ होके वनी, अर्थात् वानप्रस्थ होवें और वानप्रस्थ होके संन्यास ग्रहण करें ॥ १ ॥ जब मनुष्य ब्रह्मचर्यादि तथा सत्यभाषणादि व्रत, अर्थात् नियम धारण करता है, तब उस (व्रतेन) व्रत से उत्तम प्रतिष्ठा रूप (दीक्षाम्) दीक्षा को (आप्नोति) प्राप्त होता है। (दीक्षया) ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के नियम-पालन से (दक्षिणाम्) सत्कारपूर्वक धनादि को (आप्नोति) प्राप्त होता है। (दक्षिणा) उस सत्कार से (श्रद्धाम्) सत्य-धारण में प्रीति को (आप्नोति) प्राप्त होता है और (श्रद्धया) सत्य धार्मिक जनों में प्रीति से (सत्यम्)
२५८ संस्कारविधिः सत्य विज्ञान वा सत्य पदार्थ मनुष्य को (आप्यते) प्राप्त होता है, इसलिए श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्य और गृहाश्रम का अनुष्ठान करके वानप्रस्थ आश्रम अवश्य करना चाहिए ॥ २ ॥ अ॒भ्याद॑धामि . स॒मिध॒मग्ने॑ व्रतपते॒ त्वयि॑ । व्र॒तञ्च॑ श्र॒द्धां चोपे॑मी॒न्धे त्वा॑ दीक्षि॒तोऽअ॒हम् ॥ ३ ॥ —यजु० अ० २०। मं० २४॥ आ न॑यैतमा र॑भस्व सुकृतां लो॒कमपि॑ गच्छतु प्रजान॒न् । ती॒र्त्वा तमांसि बहु॒धा म॒हान्त्यजो नाक॒मा क्र॑मतां तृतीयम् ॥ ४ ॥ —अथर्व० का० ९। सू० ५। मं० १॥ अर्थः—हे (व्रतपते अग्ने) नियमपालकेश्वर ! (दीक्षितः) दीक्षा को प्राप्त होता हुआ (अहम्) मैं (त्वयि) तुझमें स्थिर होके (व्रतम्) ब्रह्मचर्यादि आश्रमों का धारण (च) और उसकी सामग्री, (श्रद्धाम्) सत्य की धारणा को (च) और उसके उपायों को (उपैमि) प्राप्त होता हूँ। इसीलिए अग्नि में जैसे (समिधम्) समिधा को (अभ्यादधामि) धारण करता हूँ वैसे विद्या और व्रत को धारण कर प्रज्वलित करता हूँ और वैसे हीं (त्वा) तुझे अपने आत्मा से धारण करता और सदा (ईन्धे) प्रकाशित करता हूँ ॥ ३ ॥ हे गृहस्थ ! (प्रजानन्) प्रकर्षता से जानता हुआ तू (एतम्) इस वानप्रस्थाश्रम का (आरभस्व) आरम्भ कर। (आनय) अपने मन को गृहाश्रम से इधर की ओर ला। (सुकृताम्) पुण्यात्माओं के (लोकमपि) देखने योग्य वानप्रस्थाश्रम को भी (गच्छतु) प्राप्त हो। (बहुधा) बहुत प्रकार के (महान्ति) बड़े- बड़े (तमांसि) अज्ञान, दुःख आदि संसार के मोहों को (तीर्त्वा) तरके, अर्थात् उनसे पृथक् होकर (अजः) अपने आत्मा को अजर-अमर जान (तृतीयम्) तीसरे (नाकम्) दुःख-रहित वानप्रस्थाश्रम को (आक्रमताम्) रीतिपूर्वक आरूढ हो ॥ ४ ॥
वानप्रस्थप्रकरणम् २५९ भ॒द्रमि॒च्छन्त॑ ऋष॑यः स्व॒र्विद॒स्तपो॑ दी॒क्षामुप॑नि॒षेदुरग्रे॑। ततो॑ रा॒ष्ट्रं बल॒मोज॑श्च जा॒तं तद॑स्मै दे॒वा उप॒संन॑मन्तु ॥५॥ —अथर्व० कां० १९। सू० ४१। मं० १॥ मा नौ मे॒धां मा नौ दी॒क्षां मा नौ॑ हिंसिष्ट॒ यत्तप॑ः। शि॒वा न॑ः स॒न्त्वायु॑षे शि॒वा भ॑वन्तु मा॒तर॑ः ॥६॥ —अथर्व० कां० १९। सू० ४०। मं० ३॥ अर्थ—हे विद्वान् मनुष्यो ! जैसे (स्वर्विदः) सुख को प्राप्त होनेवाले (ऋषयः) विद्वान् लोग (अग्रे) प्रथम (दीक्षाम्) ब्रह्मचर्यादि आश्रमों की दीक्षा, उपदेश लेके (तपः) प्राणायाम और विद्याध्ययन, जितेन्द्रियत्वादि शुभ लक्षणों को (उपनिषेदुः) प्राप्त होकर अनुष्ठान करते हैं, वैसे इस (भद्रम्) कल्याणकारक वानप्रस्थाश्रम की (इच्छन्तः) इच्छा करो। जैसे राजकुमार ब्रह्मचर्याश्रम को करके (ततः) तदनन्तर (ओजः) पराक्रम (च) और (बलम्) बल को प्राप्त होके (जातम्) प्रसिद्ध प्राप्त हुए (राष्ट्रम्) राज्य की इच्छा और रक्षा करते हैं और (अस्मै) न्यायकारी, धार्मिक विद्वान् राजा को (देवाः) विद्वान् लोग नमन करते हैं, (तत्) वैसे सब लोग वानप्रस्थाश्रम को धारण किये हुए आपको (उप सं नमन्तु) समीप प्राप्त होके नम्र होवें ॥५॥ सम्बन्धी जन (नः) हम वानप्रस्थाश्रमस्थों की (मेधाम्) प्रज्ञा को (मा हिंसिष्ट) नष्ट मत करे। (नः) हमारी (दीक्षाम्) दीक्षा को (मा) मत और (नः) हमारा (यत्) जो (तपः) प्राणायामादि उत्तम तप है उसको भी (मा) मत नाश करे। (नः) हमारी दीक्षा और (आयुषे) जीवन के लिए सब प्रजा (शिवाः) कल्याण करनेवाली (सन्तु) होवें। जैसे हमारी (मातरः) माता, पितामही, प्रपितामही आदि (शिवाः) कल्याण करनेहारी होती हैं, वैसे सब लोग प्रसन्न होकर मुझे वानप्रस्थाश्रम की अनुमति देनेवाले (भवन्तु) होवें ॥६॥
२६० संस्कारविधिः तपः श्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्याञ्चरन्तः। सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥७॥ —मुण्डकोपनि० मं० १। ख० २। मं० ११॥ अर्थ—हे मनुष्यो! (ये) जो (विद्वांसः) विद्वान् लोग (अरण्ये) जङ्गल में (शान्ता) शान्ति के साथ (तपःश्रद्धे) योगाभ्यास और परमात्मा में प्रीति करके (उपवसन्ति) वनवासियों के समीप वसते हैं और (भैक्ष्यचर्याम्) भिक्षाचरण को (चरन्तः) करते हुए जङ्गल में निवास करते हैं, (ते) वे (हि) ही (विरजाः) निर्दोष, निष्पाप, निर्मल होके (सूर्यद्वारेण) प्राण के द्वारा (यत्र) जहाँ (सः) वह (अमृतः) मरण-जन्म से पृथक् (अव्ययात्मा) नाशरहित (पुरुषः) पूर्ण परमात्मा विराजमान है, (हि) वहीं (प्रयान्ति) जाते हैं। इसलिए वानप्रस्थाश्रम करना अति उत्तम है ॥७॥ एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत् स्नातको द्विजः। वने वसेत्तु नियतो यथावद् विजितेन्द्रियः॥१॥ गृहस्थस्तु यदा पश्येद् वलीपलितमात्मनः। अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥२॥ सन्त्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वञ्चैव परिच्छदम्। पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गच्छेत् सहैव वा ॥३॥ अर्थ—पूर्वोक्त प्रकार विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्या पढ़के समावर्तन के समय स्नानविधि करनेवाला द्विज=ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जितेन्द्रिय, जितात्मा होके यथावत् गृहाश्रम करके वन में बसे ॥१॥ गृहस्थ लोग जब अपने देह का चमड़ा ढीला और श्वेत केश होते हुए देखें और पुत्र का भी पुत्र हो जाए, तब वन का आश्रय लेवें ॥२॥
वानप्रस्थप्रकरणम् २६१ जब वानप्रस्थाश्रम की दीक्षा लेवें, तब ग्रामों में उत्पन्न हुए पदार्थों का आहार और घर के सब पदार्थों को छोड़के पुत्रों में अपनी पत्नी को छोड़, अथवा संग में लेके वन को जावें ॥ ३ ॥ अग्निहोत्रं समादाय गृह्यं चाग्निपरिच्छदम्। ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः ॥ ४ ॥ जब गृहस्थ वानप्रस्थ होने की इच्छा करे तब अग्निहोत्र को सामग्री-सहित लेके ग्राम से निकल जङ्गल में जितेन्द्रिय होकर निवास करे ॥ ४ ॥ स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दान्तो मैत्रः समाहितः। दाता नित्यमनादाता सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ५ ॥ तापसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्ष्यमाहरेत्। गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ॥ ६ ॥ एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षा विप्रो वने वसन्। विविधाश्चौपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुतीः ॥ ७ ॥ —मनु० अ० ६ ॥ अर्थ—वहाँ जङ्गल में वेदादिशास्त्रों को पढ़ने-पढ़ाने में नित्य युक्त, मन और इन्द्रियों को जीतकर यदि स्वस्त्री भी समीप हो तथापि उससे सेवा के सिवाय विषय-सेवन, अर्थात् प्रसङ्ग कभी न करे। सबसे मित्रभाव, सावधान, नित्य देनेवाला, और किसी से कुछ भी न लेवे। सब प्राणिमात्र पर अनुकम्पा = कृपा करनेहारा होवे ॥ ५ ॥ जो जङ्गल में पढ़ाने और योगाभ्यास करनेवाले तपस्वी, धर्मात्मा, विद्वान् लोग रहते हों जोकि गृहस्थ वा वानप्रस्थ वनवासी हों, उनके घरों में से भिक्षा ग्रहण करे ॥ ६ ॥ और इस प्रकार वन में बसता हुआ इन और अन्य दीक्षाओं का सेवन करे और आत्मा तथा परमात्मा के ज्ञान के लिए नाना प्रकार की उपनिषद्, अर्थात् ज्ञान और उपासना-विधायक.
५. वानप्रस्थ, संन्यास एवं अन्त्येष्टि संस्कार
२६२ संस्कारविधिः श्रुतियों के अर्थों का विचार किया करे। इसी प्रकार जब तक संन्यास करने की इच्छा न हो तब तक वानप्रस्थ ही रहे ॥७॥ अथ विधि—वानप्रस्थाश्रम करने का समय ५० वर्ष के उपरान्त है। जब पुत्र का भी पुत्र हो जावे तब अपनी स्त्री, पुत्र, भाई-बन्धु, पुत्रवधू आदि को सब गृहाश्रम की शिक्षा करके वन की ओर यात्रा की तैयारी करे। यदि स्त्री चले तो साथ ले-जावे नहीं तो ज्येष्ठ पुत्र को सौंप जावे कि इसकी सेवा यथावत् किया करना और अपनी पत्नी को शिक्षा कर जावे कि तू सदा पुत्र आदि को धर्ममार्ग में चलने के लिए और अधर्म से हटने के लिए शिक्षा करती रहना। तत्पश्चात् पृष्ठ २२-२३ में लिखे प्रमाणे यज्ञशाला वेदी आदि सब बनावे। पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे घृत आदि सब सामग्री जोड़के पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे (ओम् भूर्भुवः स्वद्यौँ०) इस मन्त्र से अग्न्याधान और (अयन्त इध्म०) इत्यादि मन्त्रों से समिदाधान करके, पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि चार मन्त्रों से कुण्ड के चारों ओर जलप्रोक्षण करके, पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्य- भागाहुति चार और व्याहृति आज्याहुति चार करके, पृष्ठ ९- २१ में लिखे प्रमाणे स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण करके स्थालीपाक बनाकर और उसपर घृत सेचन कर निम्नलिखित मन्त्रों से आहुति देवे— ओम् काय स्वाहा। कस्मै स्वाहा। कतमस्मै स्वाहा। स्वाहाऽऽधिमाधीताय। स्वाहा मनः प्रजापतये। स्वाहा चित्तं विज्ञाताय आदित्यै स्वाहा। अदित्यै मह्यै स्वाहा। अदित्यै सुमृडी-कायै स्वाहा। सरस्वत्यै स्वाहा। सरस्वत्यै पावकायै स्वाहा। सरस्वत्यै बृहत्यै स्वाहा। पूष्णे स्वाहा। पूष्णे प्रपथ्याय स्वाहा। पूष्णे नरन्धिषाय स्वाहा। त्वष्ट्रे स्वाहा। त्वष्ट्रे तुरीपाय स्वाहा। त्वष्ट्रे पुरुरूपाय स्वाहा। —यजुः० अ० २२। मं० २०
संन्यासप्रकरणम् २६३ भुवनस्य पतये स्वाहा। अधिपतये स्वाहा। प्रजापतये स्वाहा। —यजुः० अ० २२। मं० ३२ ओम् आयुर्यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। प्राणो यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। अपानो यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। व्यानो यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। उदानो यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। समानो यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। चक्षुर्यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। श्रोत्रं यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। वाग्यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। मनो यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। आत्मा यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। ब्रह्मा यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। ज्योतिर्यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। स्वर्यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। पृष्ठं यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। यज्ञो यज्ञेन कल्पताथ्ँ स्वाहा। —यजुः० अ० २२। मं० ३३ एकस्मै स्वाहा। द्वाभ्यां स्वाहा। शताय स्वाहा। एकशताय स्वाहा। व्युष्ट्यै स्वाहा। स्वर्गाय स्वाहा। —यजुः० अ० २२। मं० ३४ इन मन्त्रों से एक-एक करके ४३ स्थालीपाक की आज्याहुति देके पुनः पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार देकर, पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे सामगान करके सब इष्ट-मित्रों से मिल, पुत्रादिकों पर सब घर का भार धरके, अग्निहोत्र की सामग्रीसहित जङ्गल में जाकर एकान्त में निवास कर योगाभ्यास, शास्त्रों का विचार, महात्माओं का संग करके स्वात्मा और परमात्मा को साक्षात् करने में प्रयत्न किया करे॥ ॥ इति वानप्रस्थसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
२६४ संस्कारविधिः अथ संन्याससंस्कारविधिं वक्ष्यामः 'संन्यास-संस्कार' उसे कहते हैं कि जिसमें मोहादि आवरण, पक्षपांत छोड़के, विरक्त होकर सब पृथिवी में परोपकार्थ विचरे, अर्थात्— सम्यङ् न्यस्यन्त्यधर्माचरणानि येन वा सम्यङ् नित्यं सत्यकर्मस्वास्त उपविशति स्थिरीभवति येन स 'संन्यासः'। संन्यासो विद्यते यस्य स 'संन्यासी'। काल—प्रथम जो वानप्रस्थ के आदि में कह आये हैं कि ब्रह्मचर्य पूरा करके गृहस्थ और गृहस्थ होके वानप्रस्थ, वानप्रस्थ होके संन्यासी होवे। यह क्रम संन्यास, अर्थात् अनुक्रम से आश्रमों का अनुष्ठान करता-करता वृद्धावस्था में जो संन्यास लेना है, उसी को 'क्रमसंन्यास' कहते हैं। द्वितीय प्रकार—'यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेद् वनाद् वा गृहाद् वा।' यह ब्राह्मणग्रन्थ का वाक्य है। अर्थः—जिस दिन दृढ़ वैराग्य प्राप्त होवे उसी दिन चाहे वानप्रस्थ का समय पूरा भी न हुआ हो, अथवा वानप्रस्थ आश्रम का अनुष्ठान न करके गृहाश्रम से ही संन्यासाश्रम ग्रहण करे, क्योंकि संन्यास में दृढ़ वैराग्य और यथार्थ ज्ञान का होना ही मुख्य कारण है। तृतीय प्रकार—'ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्' ॥ यह भी ब्राह्मणग्रन्थ का वचन है। यदि पूर्ण अखण्डित ब्रह्मचर्य, सच्चा वैराग्य और पूर्ण ज्ञान- विज्ञान को प्राप्त होकर विषयासक्ति की इच्छा आत्मा से यथावत् उठ जावे, पक्षपातरहित होकर सबके उपकार करने की इच्छा