संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ संस्कारविधिः सत्य विज्ञान वा सत्य पदार्थ मनुष्य को (आप्यते) प्राप्त होता है, इसलिए श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्य और गृहाश्रम का अनुष्ठान करके वानप्रस्थ आश्रम अवश्य करना चाहिए ॥ २ ॥ अ॒भ्याद॑धामि . स॒मिध॒मग्ने॑ व्रतपते॒ त्वयि॑ । व्र॒तञ्च॑ श्र॒द्धां चोपे॑मी॒न्धे त्वा॑ दीक्षि॒तोऽअ॒हम् ॥ ३ ॥ —यजु० अ० २०। मं० २४॥ आ न॑यैतमा र॑भस्व सुकृतां लो॒कमपि॑ गच्छतु प्रजान॒न् । ती॒र्त्वा तमांसि बहु॒धा म॒हान्त्यजो नाक॒मा क्र॑मतां तृतीयम् ॥ ४ ॥ —अथर्व० का० ९। सू० ५। मं० १॥ अर्थः—हे (व्रतपते अग्ने) नियमपालकेश्वर ! (दीक्षितः) दीक्षा को प्राप्त होता हुआ (अहम्) मैं (त्वयि) तुझमें स्थिर होके (व्रतम्) ब्रह्मचर्यादि आश्रमों का धारण (च) और उसकी सामग्री, (श्रद्धाम्) सत्य की धारणा को (च) और उसके उपायों को (उपैमि) प्राप्त होता हूँ। इसीलिए अग्नि में जैसे (समिधम्) समिधा को (अभ्यादधामि) धारण करता हूँ वैसे विद्या और व्रत को धारण कर प्रज्वलित करता हूँ और वैसे हीं (त्वा) तुझे अपने आत्मा से धारण करता और सदा (ईन्धे) प्रकाशित करता हूँ ॥ ३ ॥ हे गृहस्थ ! (प्रजानन्) प्रकर्षता से जानता हुआ तू (एतम्) इस वानप्रस्थाश्रम का (आरभस्व) आरम्भ कर। (आनय) अपने मन को गृहाश्रम से इधर की ओर ला। (सुकृताम्) पुण्यात्माओं के (लोकमपि) देखने योग्य वानप्रस्थाश्रम को भी (गच्छतु) प्राप्त हो। (बहुधा) बहुत प्रकार के (महान्ति) बड़े- बड़े (तमांसि) अज्ञान, दुःख आदि संसार के मोहों को (तीर्त्वा) तरके, अर्थात् उनसे पृथक् होकर (अजः) अपने आत्मा को अजर-अमर जान (तृतीयम्) तीसरे (नाकम्) दुःख-रहित वानप्रस्थाश्रम को (आक्रमताम्) रीतिपूर्वक आरूढ हो ॥ ४ ॥