संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंवानप्रस्थप्रकरणम् २५९ भ॒द्रमि॒च्छन्त॑ ऋष॑यः स्व॒र्विद॒स्तपो॑ दी॒क्षामुप॑नि॒षेदुरग्रे॑। ततो॑ रा॒ष्ट्रं बल॒मोज॑श्च जा॒तं तद॑स्मै दे॒वा उप॒संन॑मन्तु ॥५॥ —अथर्व० कां० १९। सू० ४१। मं० १॥ मा नौ मे॒धां मा नौ दी॒क्षां मा नौ॑ हिंसिष्ट॒ यत्तप॑ः। शि॒वा न॑ः स॒न्त्वायु॑षे शि॒वा भ॑वन्तु मा॒तर॑ः ॥६॥ —अथर्व० कां० १९। सू० ४०। मं० ३॥ अर्थ—हे विद्वान् मनुष्यो ! जैसे (स्वर्विदः) सुख को प्राप्त होनेवाले (ऋषयः) विद्वान् लोग (अग्रे) प्रथम (दीक्षाम्) ब्रह्मचर्यादि आश्रमों की दीक्षा, उपदेश लेके (तपः) प्राणायाम और विद्याध्ययन, जितेन्द्रियत्वादि शुभ लक्षणों को (उपनिषेदुः) प्राप्त होकर अनुष्ठान करते हैं, वैसे इस (भद्रम्) कल्याणकारक वानप्रस्थाश्रम की (इच्छन्तः) इच्छा करो। जैसे राजकुमार ब्रह्मचर्याश्रम को करके (ततः) तदनन्तर (ओजः) पराक्रम (च) और (बलम्) बल को प्राप्त होके (जातम्) प्रसिद्ध प्राप्त हुए (राष्ट्रम्) राज्य की इच्छा और रक्षा करते हैं और (अस्मै) न्यायकारी, धार्मिक विद्वान् राजा को (देवाः) विद्वान् लोग नमन करते हैं, (तत्) वैसे सब लोग वानप्रस्थाश्रम को धारण किये हुए आपको (उप सं नमन्तु) समीप प्राप्त होके नम्र होवें ॥५॥ सम्बन्धी जन (नः) हम वानप्रस्थाश्रमस्थों की (मेधाम्) प्रज्ञा को (मा हिंसिष्ट) नष्ट मत करे। (नः) हमारी (दीक्षाम्) दीक्षा को (मा) मत और (नः) हमारा (यत्) जो (तपः) प्राणायामादि उत्तम तप है उसको भी (मा) मत नाश करे। (नः) हमारी दीक्षा और (आयुषे) जीवन के लिए सब प्रजा (शिवाः) कल्याण करनेवाली (सन्तु) होवें। जैसे हमारी (मातरः) माता, पितामही, प्रपितामही आदि (शिवाः) कल्याण करनेहारी होती हैं, वैसे सब लोग प्रसन्न होकर मुझे वानप्रस्थाश्रम की अनुमति देनेवाले (भवन्तु) होवें ॥६॥