संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० संस्कारविधिः तपः श्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्याञ्चरन्तः। सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥७॥ —मुण्डकोपनि० मं० १। ख० २। मं० ११॥ अर्थ—हे मनुष्यो! (ये) जो (विद्वांसः) विद्वान् लोग (अरण्ये) जङ्गल में (शान्ता) शान्ति के साथ (तपःश्रद्धे) योगाभ्यास और परमात्मा में प्रीति करके (उपवसन्ति) वनवासियों के समीप वसते हैं और (भैक्ष्यचर्याम्) भिक्षाचरण को (चरन्तः) करते हुए जङ्गल में निवास करते हैं, (ते) वे (हि) ही (विरजाः) निर्दोष, निष्पाप, निर्मल होके (सूर्यद्वारेण) प्राण के द्वारा (यत्र) जहाँ (सः) वह (अमृतः) मरण-जन्म से पृथक् (अव्ययात्मा) नाशरहित (पुरुषः) पूर्ण परमात्मा विराजमान है, (हि) वहीं (प्रयान्ति) जाते हैं। इसलिए वानप्रस्थाश्रम करना अति उत्तम है ॥७॥ एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत् स्नातको द्विजः। वने वसेत्तु नियतो यथावद् विजितेन्द्रियः॥१॥ गृहस्थस्तु यदा पश्येद् वलीपलितमात्मनः। अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥२॥ सन्त्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वञ्चैव परिच्छदम्। पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गच्छेत् सहैव वा ॥३॥ अर्थ—पूर्वोक्त प्रकार विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्या पढ़के समावर्तन के समय स्नानविधि करनेवाला द्विज=ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जितेन्द्रिय, जितात्मा होके यथावत् गृहाश्रम करके वन में बसे ॥१॥ गृहस्थ लोग जब अपने देह का चमड़ा ढीला और श्वेत केश होते हुए देखें और पुत्र का भी पुत्र हो जाए, तब वन का आश्रय लेवें ॥२॥