संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवानप्रस्थप्रकरणम् २६१ जब वानप्रस्थाश्रम की दीक्षा लेवें, तब ग्रामों में उत्पन्न हुए पदार्थों का आहार और घर के सब पदार्थों को छोड़के पुत्रों में अपनी पत्नी को छोड़, अथवा संग में लेके वन को जावें ॥ ३ ॥ अग्निहोत्रं समादाय गृह्यं चाग्निपरिच्छदम्। ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः ॥ ४ ॥ जब गृहस्थ वानप्रस्थ होने की इच्छा करे तब अग्निहोत्र को सामग्री-सहित लेके ग्राम से निकल जङ्गल में जितेन्द्रिय होकर निवास करे ॥ ४ ॥ स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दान्तो मैत्रः समाहितः। दाता नित्यमनादाता सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ५ ॥ तापसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्ष्यमाहरेत्। गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ॥ ६ ॥ एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षा विप्रो वने वसन्। विविधाश्चौपनिषदीरात्मसंसिद्धये श्रुतीः ॥ ७ ॥ —मनु० अ० ६ ॥ अर्थ—वहाँ जङ्गल में वेदादिशास्त्रों को पढ़ने-पढ़ाने में नित्य युक्त, मन और इन्द्रियों को जीतकर यदि स्वस्त्री भी समीप हो तथापि उससे सेवा के सिवाय विषय-सेवन, अर्थात् प्रसङ्ग कभी न करे। सबसे मित्रभाव, सावधान, नित्य देनेवाला, और किसी से कुछ भी न लेवे। सब प्राणिमात्र पर अनुकम्पा = कृपा करनेहारा होवे ॥ ५ ॥ जो जङ्गल में पढ़ाने और योगाभ्यास करनेवाले तपस्वी, धर्मात्मा, विद्वान् लोग रहते हों जोकि गृहस्थ वा वानप्रस्थ वनवासी हों, उनके घरों में से भिक्षा ग्रहण करे ॥ ६ ॥ और इस प्रकार वन में बसता हुआ इन और अन्य दीक्षाओं का सेवन करे और आत्मा तथा परमात्मा के ज्ञान के लिए नाना प्रकार की उपनिषद्, अर्थात् ज्ञान और उपासना-विधायक.