संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ संस्कारविधिः श्रुतियों के अर्थों का विचार किया करे। इसी प्रकार जब तक संन्यास करने की इच्छा न हो तब तक वानप्रस्थ ही रहे ॥७॥ अथ विधि—वानप्रस्थाश्रम करने का समय ५० वर्ष के उपरान्त है। जब पुत्र का भी पुत्र हो जावे तब अपनी स्त्री, पुत्र, भाई-बन्धु, पुत्रवधू आदि को सब गृहाश्रम की शिक्षा करके वन की ओर यात्रा की तैयारी करे। यदि स्त्री चले तो साथ ले-जावे नहीं तो ज्येष्ठ पुत्र को सौंप जावे कि इसकी सेवा यथावत् किया करना और अपनी पत्नी को शिक्षा कर जावे कि तू सदा पुत्र आदि को धर्ममार्ग में चलने के लिए और अधर्म से हटने के लिए शिक्षा करती रहना। तत्पश्चात् पृष्ठ २२-२३ में लिखे प्रमाणे यज्ञशाला वेदी आदि सब बनावे। पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे घृत आदि सब सामग्री जोड़के पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे (ओम् भूर्भुवः स्वद्यौँ०) इस मन्त्र से अग्न्याधान और (अयन्त इध्म०) इत्यादि मन्त्रों से समिदाधान करके, पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि चार मन्त्रों से कुण्ड के चारों ओर जलप्रोक्षण करके, पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्य- भागाहुति चार और व्याहृति आज्याहुति चार करके, पृष्ठ ९- २१ में लिखे प्रमाणे स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण करके स्थालीपाक बनाकर और उसपर घृत सेचन कर निम्नलिखित मन्त्रों से आहुति देवे— ओम् काय स्वाहा। कस्मै स्वाहा। कतमस्मै स्वाहा। स्वाहाऽऽधिमाधीताय। स्वाहा मनः प्रजापतये। स्वाहा चित्तं विज्ञाताय आदित्यै स्वाहा। अदित्यै मह्यै स्वाहा। अदित्यै सुमृडी-कायै स्वाहा। सरस्वत्यै स्वाहा। सरस्वत्यै पावकायै स्वाहा। सरस्वत्यै बृहत्यै स्वाहा। पूष्णे स्वाहा। पूष्णे प्रपथ्याय स्वाहा। पूष्णे नरन्धिषाय स्वाहा। त्वष्ट्रे स्वाहा। त्वष्ट्रे तुरीपाय स्वाहा। त्वष्ट्रे पुरुरूपाय स्वाहा। —यजुः० अ० २२। मं० २०