संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २४७ यदि अधर्म का फल कर्त्ता की विद्यमानता में न हो तो पुत्रों और पुत्रों के समय में न हो तो नातियों के समय में अवश्य प्राप्त होता है, किन्तु यह कभी नहीं हो सकता कि कर्त्ता का किया हुआ कर्म निष्फल होवे ॥ १९॥ इसलिए मनुष्यों को योग्य है कि सत्य, धर्म और आर्य, अर्थात् उत्तम पुरुषों के आचरणों और भीतर-बाहर की पवित्रता में सदा रमण करें। अपनी वाणी, बाहू, उदर को नियम और सत्यधर्म के साथ वर्त्तमान रखके शिष्यों को सदा शिक्षा किया करें ॥ २० ॥ परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ । धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च ॥ २१ ॥ धर्मं शनैस्सञ्चिनुयाद् वल्मीकमिव पुत्तिकाः । परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ २२ ॥ उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं सम्बन्धानाचरेत् सह । निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमाँस्त्यजेत् ॥ २३ ॥ वाच्यार्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तान्तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २४ ॥ स्वाध्यायेन जपैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः । महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ २५ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—जो धर्म से वर्जित धनादि पदार्थ और काम हों, उन्हें सर्वथा शीघ्र छोड़ देवे और जो धर्माभास, अर्थात् उत्तरकाल में दुःखदायक कर्म हैं और जो लोगों को निन्दित कर्म में प्रवृत्त करनेवाले कर्म हैं, उनसे भी दूर रहे ॥ २१ ॥ जैसे दीमक धीरे-धीरे बड़े भारी घर को बना लेती है, वैसे मनुष्य परजन्म के सहाय के लिए सब प्राणियों को पीड़ा