संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ संस्कारविधिः यद्यत् परवशं कर्म तत्तद् यत्नेन वर्जयेत्। यद्यदात्मवशं तु स्यात् तत्तत् सेवेत यत्नतः॥ १५॥ सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥ १६॥ अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम्। हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते॥ १७॥ अर्थः—मनुष्य जो-जो पराधीन कर्म हो उस-उसको प्रयल से सदा छोड़े और जो-जो स्वाधीन कर्म हो उस-उसका सेवन प्रयल से किया करे॥ १५॥ क्योंकि जितना परवश होना है वह सब दुःख और जितना स्वाधीन रहना है, वह सब सुख कहाता है। यही संक्षेप से सुख और दुःख का लक्षण जानो॥ १६॥ जो अधार्मिक मनुष्य है और जिसका अधर्म से सञ्चित किया हुआ धन है और जो सदा हिंसा में, अर्थात् वैर में प्रवृत्त रहता है, वह इस लोक और परलोक, अर्थात् परजन्म में सुख को प्राप्त कभी नहीं हो सकता॥ १७॥ नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव। शनैरावर्त्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति॥ १८॥ यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पुत्रेषु नप्तृसु। न त्वेवन्तु कृतोऽधर्मः कर्त्तुर्भवति निष्फलः॥ १९॥ सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत् सदा। शिष्याँश्च शिष्याद् धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः॥ २०॥ अर्थः—मनुष्य निश्चय करके जाने कि इस संसार में जैसे गाय की सेवा का फल दूध आदि शीघ्र नहीं होता, वैसे ही किये हुए अधर्म का फल भी शीघ्र नहीं होता, किन्तु धीरे- धीरे अधर्म कर्त्ता के सुखों को रोकता हुआ सुख के मूलों को काट देता है। पश्चात् अधर्मी दुःख-ही-दुःख भोगता है॥ १८॥