संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ संस्कारविधिः इन दश मन्त्रों से घृतमिश्रित भात की, यदि भात न बना हो तो क्षार और लवणान्न को छोड़के जो कुछ पाक में बना हो उसी की दश आहुति करे। तत्पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से बलि प्रदान करे— ओं सानुगायेन्द्राय नमः ॥ इससे पूर्व। ओं सानुगाय यमाय नमः ॥ इससे दक्षिण। ओं सानुगाय वरुणाय नमः ॥ इससे पश्चिम। ओं सानुगाय सोमाय नमः ॥ इससे उत्तर। ओं मरुद्भ्यो नमः ॥ इससे द्वार। ओम् अद्भ्यो नमः ॥ इससे जल ओं वनस्पतिभ्यो नमः ॥ इससे मूसल और ऊखल। ओं श्रियै नमः ॥ इससे ईशान। ओं भद्रकाल्यै नमः ॥ इससे नैर्ऋत्य। ओं ब्रह्मपतये नमः। ओं वास्तुपतये नमः ॥ इनसे मध्य। ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः ॥ ओं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः ॥ ओं नक्तंचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः। इनसे ऊपर। ओं सर्वात्मभूतये नमः ॥ इससे पृष्ठ। ओं पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः ॥ इससे दक्षिण। इन मन्त्रों से एक पत्तल वा थाली में यथोक्त दिशाओं में भाग धरना। यदि भाग धरने के समय कोई अतिथि आ जाए तो उसी को दे देना, नहीं तो अग्नि में धर देना। तत्पश्चात् घृतसहित लवणान्न लेके— शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्। वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद् भुवि ॥ अर्थ—कुत्ता, पतित, चाण्डाल, पापरोगी, काक और