भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

गृहाश्रमप्रकरणम् २०५ प्राप्त होकर स्त्रियाँ जिन गृहस्थों को शाप देती हैं, वे कुल तथा गृहस्थ जैसे विष देकर बहुतों को एक बार नाश कर देवें, वैसे चारों ओर से नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं॥७॥ तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः। भूतिकामैर्न रैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च॥८॥ —मनु० ॥ अर्थ—इस कारण ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाले पुरुषों को योग्य है कि सत्कार के अवसरों और उत्सवों में स्त्रियों की भूषण, वस्त्र, खान-पान आदि से सदा पूजा, अर्थात् सत्कार कर प्रसन्न रखें॥८॥ सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया। सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया॥९॥ —मनु० ॥ अर्थ—स्त्री को योग्य है कि सदा आनन्दित होके चतुरता से गृहकार्यों में वर्त्तमान रहे तथा अन्नादि के उत्तम संस्कार, पात्र, वस्त्र, गृह आदि के संस्कार और घर के भोजनादि में जितना धन आदि नित्य लगे, उस व्यय के यथायोग्य करने में सदा प्रसन्न रहें॥९॥ एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः। उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥१०॥ अर्थ—यदि स्त्रियाँ दुष्टाचारयुक्त भी हों, तथापि इस संसार में बहुत स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों के शुभ गुणों से उत्कृष्ट हो गईं, होती हैं और होंगी भी। इसलिए यदि पुरुष श्रेष्ठ हों तो स्त्रियाँ श्रेष्ठ और पुरुष दुष्ट हों तो स्त्रियाँ दुष्ट हो जाती हैं। इससे प्रथम मनुष्यों को उत्तम होके अपनी स्त्रियों को उत्तम करना चाहिए॥१०॥ प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः। स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन॥११॥