संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२०६ संस्कारविधिः उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम्। प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम्॥१२॥ अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा। दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितॄणामात्मनश्च ह॥१३॥ यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः। तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमाः॥१४॥ —मनु०॥ अर्थ—हे पुरुषो! सन्तानोत्पत्ति के लिए महाभाग्योदय करनेहारी, पूजा के योग्य, गृहाश्रम को प्रकाशित करनेवाली, सन्तानोत्पत्ति करने-करानेवाली घरों में जो स्त्रियाँ हैं वे श्री, अर्थात् लक्ष्मीस्वरूप होती हैं, क्योंकि लक्ष्मी, शोभा, धन और स्त्रियों में कुछ भेद नहीं है॥११॥ हे पुरुषो! अपत्यों की उत्पत्ति, उत्पन्न का पालन करने आदि लोकव्यवहार का नित्यप्रति, जोकि गृहाश्रम का कार्य होता है, निबन्ध करनेवाली प्रत्यक्ष स्त्री ही है॥१२॥ सन्तानोत्पत्ति, धर्म-कार्य, उत्तम सेवा और रति तथा अपना और पितरों का जितना सुख है, वह सब स्त्री ही के अधीन होता है॥१३॥ जैसे वायु के आश्रय से सब जीवों का वर्त्तमान सिद्ध होता है, वैसे ही गृहस्थ के आश्रय से ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी, अर्थात् सब आश्रमों का निर्वाह होता है॥१४॥ यस्मात् त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम्। गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही॥१५॥ स संधार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता। सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः॥१६॥ सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः। गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः त्रीनेतान् बिभर्ति हि॥१७॥