संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ संस्कारविधिः से अन्नादि का ग्रहण करना अतिथियों का काम है, गृहस्थों का नहीं ॥ १९ ॥ जब गृहस्थ के समीप अतिथि आवें तब आसन, निवास, शय्या, पश्चाद्गमन और समीप में बैठना आदि सत्कार जैसे का वैसा, अर्थात् उत्तम का उत्तम, मध्यम का मध्यम और निकृष्ट का निकृष्ट करे। ऐसा न हो कि सब अन्न बारा बसेरी, कस्तूरी और धूड़ को बराबर कभी न समझे ॥ २० ॥ किन्तु जो पाखण्डी, वेदनिन्दक, नास्तिक—ईश्वर, वेद और धर्म को न माने, अधर्माचरण करनेहारे, हिंसक, शठ, मिथ्याभिमानी, कुतर्की और बकवृत्ति, अर्थात् पराये पदार्थ हरने वा बहकाने में बगुले के समान अतिथिवेशधारी बनके आवें, उनका वचनमात्र से भी सत्कार गृहस्थ कभी न करे ॥ २१ ॥ दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः। दशध्वजममो वेषो दशवेषसमो नृपः ॥ २२ ॥ न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथंचन। अजिह्यामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम् ॥ २३ ॥ सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत् सदा। शिष्याँश्च शिष्याद् धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः ॥ २४ ॥ परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ। धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च ॥ २५ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—दश हत्या के समान चक्र अर्थात् कुम्हार, गाड़ी से जीविका करनेवाले, दश चक्र के समान ध्वज अर्थात् धोबी, मद्य को निकालकर बेचनेवाले, दश ध्वज के समान वेष, अर्थात् वेश्या, भडुआ, भाँड, दूसरे की नकल अर्थात् पाषाणमूर्तियों के पूजक (=पुजारी) आदि और दश वेष के समान अन्यायकारी जो राजा होता है, उनके अन्न आदि का ग्रहण अतिथि लोग कभी न करें ॥ २२ ॥