संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २०९ गृहस्थ जीविका के लिए भी कभी शास्त्रविरुद्ध लोकाचार का बर्त्ताव न वर्त्तें, किन्तु जिसमें किसी प्रकार की कुटिलता, मूर्खता, मिथ्यापन वा अधर्म न हो, उस वेदोक्त कर्म-सम्बन्धी जीविका को करे ॥ २३ ॥ सत्य धर्म, आर्य अर्थात् आप्त पुरुषों के व्यवहार और शौच = पवित्रता ही में सदा गृहस्थ लोग प्रवृत्त रहें और सत्यवाणी बोलते हुए, भोजनादि के लोभरहित, हस्तपादादि की कुचेष्टा छोड़कर धर्म से शिष्यों और सन्तानों को उत्तम शिक्षा सदा किया करें ॥ २४ ॥ यदि बहुत-सा धन, राज्य-प्राप्ति और अपनी कामना अधर्म से सिद्ध होती हो तो भी अधर्म को सर्वथा छोड़ देवें और वेदविरुद्ध धर्माभास जिसके करने से उत्तरकाल में दुःख और संसार की उन्नति का नाश हो, वैसा नाममात्र का धर्म कभी न किया करें ॥ २५ ॥ सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ॥ २६ ॥ क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिणः। प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥ २७ ॥ अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति। विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ २८ ॥ दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत्। त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ॥ २९ ॥ दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्त्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ ३० ॥ तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्। समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥ ३१ ॥ —मनु० ॥