संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् १९९ (धर्मश्च) पक्षपातरहित न्यायाचरण, वेदोक्त धर्म और जो इसके साधन वा लक्षण हैं, उन्हें प्राप्त होके इन्हीं में सदा वर्त्ता करो॥ २४॥ ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं च॒ राष्ट्रं च॒ विश॑श्च॒ त्विषि॑श्च॒ यश॑श्च॒ वर्च॑श्च॒ द्रवि॑णं च॥ २५॥ आयु॑श्च रू॒पं च॒ नाम॑ च॒ कीर्ति॑श्च॒ प्रा॒णश्चा॑पा॒नश्च॒ चक्षु॑श्च॒ श्रोत्रं॑ च॥ २६॥ पय॑श्च॒ रस॑श्चान्नं॒ चान्नाद्यं॑ च ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चे॒ष्टं च॑ पू॒र्तं च॑ प्र॒जा च॑ प॒शव॑श्च॥ २७॥ —अथर्व० कां० १२। अ० ५। वर्ग १-२॥ अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो! तुमको योग्य है कि (ब्रह्म च) पूर्ण विद्यादि शुभ गुणयुक्त मनुष्य और सबके उपकारक शम-दमादि गुणयुक्त ब्रह्मकुल, (क्षत्रं च) विद्यादि उत्तम गुणयुक्त तथा विनय और शौर्यादि गुणों से युक्त क्षत्रियकुल (राष्ट्रं च) राज्य और उसका न्याय से पालन, (विशश्च) उत्तमे प्रजा और उनकी उन्नति, (त्विषिश्च) सद्विद्यादि से तेज, आरोग्य, शरीर और आत्मा के बल से प्रकाशमान और इसकी उन्नति से (यशश्च) कीर्तियुक्त तथा इसके साधनों को प्राप्त हुआ करो। (वर्चश्च) पढ़ी हुई विद्या का विचार और उसका नित्य पढ़ना, (द्रविणं च) द्रव्योपार्जन, उसकी रक्षा और धर्मयुक्त परोपकार में व्यय करने आदि कर्मों को सदा किया करो॥ २५॥ हे स्त्री-पुरुषो! तुम अपना (आयुः) जीवन बढ़ाओ, (च) और सब जीवन में धर्मयुक्त उत्तम कर्म ही किया करो। (रूपं च) विषयासक्ति, कुपथ्य, रोग और अधर्माचरण को छोड़के अपने स्वरूप को अच्छा रक्खो और वस्त्राभूषण भी धारण किया