संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९६ संस्कारविधिः से (देवाः) विद्वान् लोग (मिथः) परस्पर (न वियन्ति) पृथक् भाववाले नहीं होते, (च) और (नो विद्विषते) परस्पर में द्वेष कभी नहीं करते, (तत्) वही कर्म (वः) तुम्हारे (गृहे) घर में (कृण्मः) निश्चित करता हूँ। (पुरुषेभ्यः) पुरुषों को (संज्ञानम्) अच्छे प्रकार चिताता हूँ कि तुम लोग परस्पर प्रीति से वर्त्तकर बड़े (ब्रह्म) धनैश्वर्य को प्राप्त होओ॥ १७॥ ज्याय॑स्वन्तश्चित्तिनो॒ मा वि यौ॑ष्ट॒ संरा॑धयन्तः॒ सधुरा॑श्चरन्तः॑। अ॒न्यो अ॒न्यस्मै॑ व॒ल्गु वद॑न्त॒ एतं॑ स॒ध्रीची॑नान्त्वः संम॑नसस्कृणोमि॥ १८॥ अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो! तुम (ज्यायस्वन्तः) उत्तम विद्यादिगुणयुक्त, (चित्तिनः) विद्वान्, संज्ञान, (सधुराः) धुरन्धर होकर (चरन्तः) विचरते और (संराधयन्तः) परस्पर मिलके धन-धान्य, राज्यसमृद्धि को प्राप्त होते हुए (मा वियौष्ट) विरोधी वा पृथक्-पृथक् भाव मत करो। (अन्यः) एक (अन्यस्मै) दूसरे के लिए (वल्गु) सत्य, मधुर भाषण (वदन्तः) कहते हुए एक-दूसरे को (एत) प्राप्त होओ। इसीलिए (सध्रीचीनान्) समान लाभाऽलाभ से एक-दूसरे के सहायक, (संमनसः) एकमत्यवाले (वः) तुमको (कृणोमि) करता हूँ, अर्थात् मैं ईश्वर तुमको जो आज्ञा देता हूँ, इसको आलस्य छोड़कर किया करो॥ १८॥ समा॒नी प्र॒पा स॒ह वो॑ऽन्नभा॒गः स॑मा॒ने योक्त्रे॑ स॒ह वो॑ युनज्मि। स॒म्यञ्चो॒ऽग्निं स॑प॒र्यता॑रा॒ नाभि॑मि॒वाभि॑तः॥ १९॥ स॒ध्रीची॑नान्त्वः संम॑नसस्कृणोम्ये॑क॑श्रुष्टीन्त्संव॑नने॒न सर्वा॑न्। दे॒वाइ॑वा॒मृतं॒ रक्ष॑माणाः सा॒यं प्रा॒तः सौम॑नसो वो॑ अस्तु॥ २०॥ —अथर्व० कां० ३। सू० ३०। मन्त्र १–७॥