संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् १९७ अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो ! मुझ ईश्वर की आज्ञा से तुम्हारा (प्रपा) जलपान, स्नानादि का स्थान आदि व्यवहार (समानी) एक-सा हो। (वः) तुम्हारा (अन्नभागः) खान-पान (सह) साथ हुआ करे। (वः) तुम्हारे (समाने) एक-से (योक्त्रे) अश्वादि यान के जोते (सह) संगी हों और तुमको मैं धर्मादि व्यवहार में भी एकीभूत करके (युनज्मि) नियुक्त करता हूँ। जैसे (अराः) चक्र के आरे (अभितः) चारों ओर से (नाभिमिव) बीच के नालरूप काष्ठ में लगे रहते हैं, अथवा जैसे ऋत्विज् लोग और यजमान यज्ञ में मिलके (अग्निम्) अग्नि आदि के सेवन से जगत् का उपकार करते हैं, वैसे (सम्यञ्चः) सम्यक् प्राप्तिवाले तुम मिलके धर्मयुक्त कर्मों को और (सपर्यत) एक-दूसरे का हित सिद्ध किया करो॥ १९॥ हे गृहस्थादि मनुष्यो ! मैं ईश्वर (वः) तुमको (सध्रीचीनान्) सह वर्त्तमान, (संमनसः) परस्पर के लिए हितैषी, (एकश्रुष्टीन्) एक ही धर्मकृत्य में शीघ्र प्रवृत्त होनेवाले (सर्वान्) सबको (संवननेन) धर्मकृत्य के सेवन के साथ एक-दूसरे के उपकार में नियुक्त (कृणोमि) करता हूँ। तुम (देवाइव) विद्वानों के समान (अमृतम्) व्यावहारिक वा पारमार्थिक सुख की (रक्षमाणाः) रक्षा करते हुए (सायंप्रातः) सन्ध्या और प्रातःकाल, अर्थात् सब समय में एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक मिला करो। ऐसे करते हुए (वः) तुम्हारा (सौमनसः) मन का आनन्दयुक्त शुद्धभाव (अस्तु) सदा बना रहे॥ २०॥ श्रमेण॒ तप॑सा सृष्टा ब्रह्म॑णा वित्त ऋ॒ते श्रि॒ताः॥ २१॥ स॒त्येनावृ॑ताः श्रिया॒ प्रावृ॑ता यश॑सा परी॑वृताः॥ २२॥ स्व॒धया॒ परि॑हिताः श्र॒द्धया॒ पर्यू॑ढा दी॒क्षया॑ गु॒प्ता य॒ज्ञे प्रति॑ष्ठिता लो॒को नि॒धन॑म्॥ २३॥