संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 197, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् १९३ इ॒हेमावि॑न्द्र॒ सं नु॑द च॒क्रवा॒केव॑ दम्प॑ती । प्र॒जयै॑नौ स्वस्तुकौ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुताम् ॥ ११ ॥ ज॒नियन्ति॑ ना॒व॑ग्रवः पु॒त्रियन्ति॑ सु॒दान॑वः । अरि॑ष्टा॒सू सचेवहि बृ॒हते वाज॑सातये ॥ १२ ॥ अर्थ—हे स्त्री और पुरुष ! जैसे सूर्य (विभातीः) सुन्दर प्रकाशयुक्त (उषसः) प्रभातवेला को प्राप्त होता है, वैसे (स्योनात्) सुख से (योनेः) घर के मध्य में (अधि बुध्यमानौ) सन्तानोत्पत्ति आदि की क्रिया को अच्छे प्रकार जाननेवाले, सदा (हसामुदौ) हास्य और आनन्दयुक्त, (महसा) बड़े प्रेम से (मोदमानौ) अत्यन्त प्रसन्न हुए, (सुगू) उत्तम चाल चलने से धर्मयुक्त व्यवहार में अच्छे प्रकार चलनेवाले, (सुपुत्रौ) उत्तम पुत्रवाले, (सुगृहौ) श्रेष्ठ गृहादि सामग्रीयुक्त (जीवौ) उत्तम प्रकार जीवों को धारण करते हुए (तराथः) गृहाश्रम के व्यवहारों के पार होओ ॥ १० ॥ हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त विद्वान् राजन् ! आप (इह) इस संसार में (इमौ) इन स्त्री-पुरुषों को समय पर विवाह करने की आज्ञा और ऐसी व्यवस्था दीजिए कि जिससे कोई स्त्री- पुरुष पृष्ठ ११२-१२६ में लिखे प्रमाण से पूर्व वा अन्यथा विवाह न कर सकें, वैसे (सं नुद) सबको प्रसिद्धि से प्रेरणा कीजिए, जिससे ब्रह्मचर्यपूर्वक शिक्षा को पाके (दम्पती) जाया और पति (चक्रवाकेव) चकवा-चकवी के समान एक-दूसरे से प्रेमबद्ध रहें और गर्भाधानसंस्कारोक्तविधि से (प्रजया) उत्पन्न हुई प्रजा से (एनौ) ये दोनों (स्वस्तकौ) सुखयुक्त होके (विश्वम्) सम्पूर्ण—सौ वर्षपर्यन्त (आयुः) आयु को (व्यश्नुताम्) प्राप्त होवें ॥ ११ ॥ हे मनुष्यो ! जैसे (सुदानवः) विद्यादि उत्तम गुणों के दान करनेवाले (अग्रवः) उत्तम स्त्री-पुरुष (जनियन्ति) पुत्रोत्पत्ति