भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 198

१९४ संस्कारविधिः करते और (पुत्रियन्ति) पुत्र की कामना करते हैं, वैसे (नौ) हमारे भी सन्तान उत्तम होवें तथा (अरिष्टासू) बल, प्राण का नाश न करनेवाले होकर (बृहते) बड़े (वाजसातये) परोपकार के अर्थ विज्ञान और अन्न आदि के दान के लिए (सचेवहि) कटिबद्ध सदा रहें, जिससे हमारे सन्तान भी उत्तम होवें ॥ १२ ॥ प्र बु॒ध्यस्व सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना दी॒र्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय । गृ॒हान् ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी यथासौ दी॒र्घं त॒ आयु॑: स॒वि॒ता कृ॒णोतु॑ ॥ १३ ॥ स॒हृद॑यं सांम॑न॒स्यम॑विद्वे॒षं कृ॒णोमि॑ वः । अ॒न्यो अ॒न्यम॒भि ह॑र्यत व॒त्सं जा॒तमि॑वा॒घ्न्या ॥ १४ ॥ अर्थ—हे पत्नि ! तू (शतशारदाय) शतवर्षपर्यन्त (दीर्घायुत्वाय) दीर्घकाल जीने के लिए (सुबुधा) उत्तम बुद्धियुक्त, (बुध्यमाना) संज्ञान होकर (गृहान्) मेरे घरों को (गच्छ) प्राप्त हो और (गृहपत्नी) मुझ घर के स्वामी की स्त्री (यथा) जैसे (ते) तेरा (दीर्घम्) दीर्घकाल-पर्यन्त (आयुः) जीवन (आसः) होवे, वैसे (प्रबुध्यस्व) प्रकृष्ट ज्ञान और उत्तम व्यवहार को यथावत् जान । इस अपनी आशा को (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति और सम्पूर्ण ऐश्वर्य को देनेवाला परमात्मा (कृणोतु) अपनी कृपा से सदा सिद्ध करे । जिससे तू और मैं सदा उन्नतिशील होकर आनन्द में रहें ॥ १३ ॥ हे गृहस्थो ! मैं ईश्वर तुमको जैसी आज्ञा देता हूँ, वैसा ही वर्त्तमान करो, जिससे तुम्हें अक्षय सुख हो, अर्थात् (वः) तुम्हारा (सहृदयम्) जैसी अपने लिए सुख की इच्छा करते और दुःख नहीं चाहते हो, वैसे माता-पिता, सन्तान, स्त्री-पुरुष, भृत्य, मित्र, पड़ोसी और अन्य सबसे समान हृदय रहो । (सांमनस्यम्) मन से सम्यक् प्रसन्नता और (अविद्वेषम्) वैर-विरोधादिरहित व्यवहार को तुम्हारे लिए (कृणोमि) स्थिर करता हूँ। तुम