संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ संस्कारविधिः गृहाश्रम में (अग्रे) प्रथम (देवाः) विद्वान् लोग (पत्नीः) उत्तम स्त्रियों को (न्यपद्यन्त) प्राप्त होते हैं और (तनूभिः) शरीरों से (तन्वः) शरीरों को (समस्पृशन्त) स्पर्श करते हैं, वैसे (विश्वरूपा) विविध सुन्दररूप को धारण करनेहारी, (महित्वा) सत्कार को प्राप्त होके (सूर्येव) सूर्य की कान्ति के समान (पत्या) अपने स्वामी के साथ मिलके (प्रजावती) प्रजा को प्राप्त होनेवाली (सम्भव) अच्छे प्रकार हो ॥ ७ ॥ हे स्त्री-पुरुषो ! तुम (पितरौ) बालकों के जनक (ऋत्विये) ऋतुसमय में सन्तानों को (संसृजेथाम्) अच्छे प्रकार उत्पन्न करो। (माता) जननी (च) और (पिता) जनक दोनों (रेतः) वीर्य को मिलाकर गर्भाधान करनेवाले (भवाथः) होओ। हे पुरुष ! (एनाम्) इस (योषाम्) अपनी स्त्री को (मर्यः इव) प्राप्त होनेवाले पति के समान (अधि रोहय) सन्तानों से बढ़ा और दोनों (इह) इस गृहाश्रम में मिलके (प्रजाम्) प्रजा को (कृण्वाथाम्) उत्पन्न करो, (पुष्यतम्) पालन-पोषण करो और पुरुषार्थ से (रयिम्) धन को प्राप्त होओ ॥ ८ ॥ हे (पूषन्) वृद्धिकारक पुरुष ! (यस्याम्) जिसमें (मनुष्याः) मनुष्य लोग (बीजम्) वीर्य को (वपन्ति) बोते हैं, (या) जो (नः) हमारी (उशती) कामना करती हुई (ऊरू) ऊरू को सुन्दरता से (विश्रयाति) विशेषकर आश्रय करती है, (यस्याम्) जिमें (उशन्तः) सन्तानों की कामना करते हुए हम (शेपः) उपस्थेन्द्रिय का (प्रहरेम) प्रहरण करते हैं, (ताम्) उस (शिवतमाम्) अतिशय कल्याण करनेवाली स्त्री को सन्तानोत्पत्ति के लिए (एरयस्व) प्रेम से प्रेरणा कर ॥ ९ ॥ स्यो॒नाद् योने॒रधि॑ बु॒ध्यमा॑नौ ह॒सामु॒दौ मह॑सा॒ मोद॑मानौ । सु॒गू सु॑पु॒त्रौ सु॑गृ॒हौ तराथो॒ जीवावु॒षसो॑ विभा॒तीः ॥ १० ॥