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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

१९६ संस्कारविधिः जो कोई ब्रह्मचारी होकर पुनः ऋतुगामी, पर-स्त्रीत्यागी, एकस्त्रीव्रत, गर्भ रहे पश्चात् एक वर्षपर्यन्त ब्रह्मचारी न रहेगा, वह भी बना- बनाया धूल में मिल जाएगा और चौथी चालीसवें वर्ष से यावत् निर्वीर्य न हो, तवात् किञ्चित् हानिरूप अवस्था है। जो किञ्चित् हानि के बदले वीर्य की अधिक हानि करेगा, वह राजयक्ष्मा और भगन्दरादि रोगों से पीड़ित हो जाएगा और जो इन चारों अवस्थाओं को यथोक्त सुरक्षित रक्खेगा, वह सदा आनन्दित होकर सब संसार को सुखी कर सकेगा ॥ १ ॥ अब इसमें इतना विशेष समझना चाहिए कि स्त्री और पुरुष के शरीर में पूर्वोक्त चारों अवस्थाओं का एक-सा समय नहीं है, किन्तु जितना सामर्थ्य पच्चीसवें वर्ष में पुरुष के शरीर में होता है उतना सामर्थ्य स्त्री के शरीर में सोलहवें वर्ष में हो जाता है। यदि बहुत शीघ्र विवाह करना चाहे तो २५ वर्ष का पुरुष और १६ वर्ष की कन्या दोनों तुल्य सामर्थ्यवाले होते हैं। इसलिए इस अवस्था में जो विवाह करना, वह अधम विवाह है और जो सत्रहवें वर्ष की कन्या और ३० वर्ष का पुरुष, अठारह वर्ष की कन्या और ३६ वर्ष का पुरुष, उन्नीस वर्ष की कन्या और ३८ वर्ष का पुरुष विवाह करे तो इसको मध्यम समय जानो और जो बीस, इक्कीस, बाईस, तेईस वा चौबीस वर्ष की स्त्री और चालीस, बयालीस, चवालीस, छयालीस और अड़तालीस वर्ष का पुरुष होकर विवाह करे, वह सर्वोत्तम है। हे ब्रह्मचारिन्! इन बातों को तू ध्यान में रख, जोकि तुझे आगे के आश्रमों में काम आवेंगी। जो मनुष्य अपने सन्तान, कुल, सम्बन्धी और देश की उन्नति करना चाहें, वे इन पूर्वोक्त और आगे कही हुई बातों का यथावत् आचरण करें ॥ २ ॥ श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी । पायूपस्थं हस्तपादं वाक् चैव दशमी स्मृता ॥ १ ॥