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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 119

वेदारम्भप्रकरणम् १९५ पूर्णबल, पूर्णप्रज्ञा, पूर्ण शुभ गुण-कर्म-स्वभावयुक्त, सूर्यवत् प्रकाशमान होकर ब्रह्मचारी सब विद्याओं को ग्रहण करता है॥६॥ यदि कोई इस सर्वोत्तम धर्म से गिराना चाहे, उससे ब्रह्मचारी उत्तर देवे कि—अरे छोकरों के छोकरे ! मुझसे दूर रहो। तुम्हारे दुर्गन्धरूप भ्रष्ट वचनों से मैं दूर रहता हूँ। मैं इस उत्तम ब्रह्मचर्य का लोप कभी न करूँगा। इसको पूर्ण करके सर्वरोगों से रहित, सर्वविद्यादि शुभ गुण-कर्म-स्वभावसहित होऊँगा। इस मेरी शुभ प्रतिज्ञा को परमात्मा अपनी कृपा से पूर्ण करे। जिससे मैं तुम निर्बुद्धियों को उपदेश और विद्या पढ़ाके विशेष तुम्हारे बालकों को आनन्दयुक्त कर सकूँ ॥७॥ चतस्रोऽवस्थाः शरीरस्य वृद्धियौवनं सम्पूर्णता किञ्चित् परिहाणिश्चेति। तत्राषोडशाद् वृद्धिः। आपञ्च- विंशतेर्यौवनम्। आचत्वारिंशतस्सम्पूर्णता। ततः किञ्चित् परिहाणिश्चेति ॥ १ ॥ पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु षोडशे। समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात् कुशलो भिषक् ॥ २ ॥ यह धन्वन्तरिजीकृत सुश्रुतग्रन्थ का प्रमाण है॥ अर्थः—इस मनुष्य देह की चार अवस्थाएँ हैं—एक वृद्धि, दूसरी यौवन, तीसरी सम्पूर्णता, चौथी किञ्चित्परिहाणि। इनमें सोलहवें वर्ष तक वृद्धि होती है। जो कोई इस वृद्धि की अवस्था में वीर्यादि धातुओं का नाश करेगा, वह कुल्हाड़े से काटे वृक्ष वा डण्डे से फूटे घड़े के समान अपने सर्वस्व का नाश करके पश्चात्ताप करेगा। पुनः उसके हाथ में सुधार कुछ भी न रहेगा। दूसरी युवावस्था पच्चीसवें वर्ष तक होती है। जो कोई इसको यथावत् संरक्षित न करेगा, वह अपनी भाग्यशीलता को नष्ट कर देवेगा। तीसरी पूर्ण युवावस्था चालीसवें वर्ष में होती है।