भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

१३० संस्कारविधिः से कुण्ड में तीन समिधा होमकर, पृ० १०१ में लिखे प्रमाणे (ओम् तनूपा०) इत्यादि सात मन्त्रों से दक्षिण हस्ताञ्जलि आग पर थोड़ी-सी तपा, उस जल से मुखस्पर्श और तत्पश्चात् पृ० १०१ में लिखे प्रमाणे (ओं वाक् च म०) इत्यादि मन्त्रों से उक्त प्रमाणे अङ्ग-स्पर्श करे। पुनः सुगन्धादि औषधयुक्त जल से भरे हुए आठ घड़े वेदी के उत्तरभाग में जो पूर्व से रक्खे हुए हों, उन घड़ों में से— ओं ये अप्स्वन्तरग्नयः प्रविष्टा गोह्य उपगोह्यो मयूषो मनोहास्खलो विरुजस्तनूदूषुरिन्द्रियहा तान् विजहामि यो रोचनस्तमिह गृह्णामि ॥ इस मन्त्र को पढ़, एक घड़े को ग्रहण करके, उस घड़े में से जल लेके—' ओं तेन मामभिसिञ्चामि श्रियै यशसे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय ॥ इस मन्त्र को बोलके स्नान करना। तत्पश्चात् उपरिकथित (ओं ये अप्स्वन्तर०) इस मन्त्र को बोलके दूसरे घड़े को ले, उसमें से लोटे में जल लेके— ओं येन श्रियमकृणुतां येनावमृशताथँ सुराम्। येनाक्ष्यावभ्यसिञ्चितां यद्द्वां तदश्विना यशः ॥ इस मन्त्र को बोलके स्नान करना। तत्पश्चात् पूर्ववत् ऊपर के (ओं ये अप्स्वन्तर०) इसी मन्त्र का पाठ बोलके वेदी के उत्तर में रक्खे घड़ों में से तीन घड़ों को लेके पृ० ९४-९५ में लिखे हुए (ओं आपो हि ष्ठा०) इन तीन मन्त्रों को बोलके, उन घड़ों के जल से स्नान करना। तत्पश्चात् आठ घड़ों में से रहे हुए तीन घड़ों को लेके (ओं आपो हि ष्ठा०) इन्हीं तीन मन्त्रों को बोलके स्नान करे। पुनः—

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक) · पृष्ठ 134, कुल 318 में से · BharatKosha