संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमावर्त्तनप्रकरणम् १२९ इसका समय—पृष्ठ ११२-११३ तक में लिखे प्रमाणे जानना, परन्तु जब विद्या, हस्तक्रिया, ब्रह्मचर्यव्रत भी पूरा होवे, तभी गृहाश्रम की इच्छा स्त्री और पुरुष करें। विवाह के स्थान दो हैं—एक आचार्य का घर दूसरा अपना घर। दोनों ठिकानों में से किसी एक ठिकाने आगे विवाह में लिखे प्रमाणे सब विधि करे। इस संस्कार का विधि पूरा करके पश्चात् विवाह करे। विधि—जो शुभ दिन समावर्त्तन का नियत करे, उस दिन आचार्य के घर में पृ० २३ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड आदि बनाके सब शाकल्य और सामग्री संस्कार दिन से पूर्व दिन में जोड़ रक्खे और स्थालीपाक* बनाके तथा घृतादि और पात्रादि यज्ञशाला में वेदी के समीप रक्खे, पुनः पृ० २९ में लिखे प्रमाणे यथावत् चारों दिशाओं में आसन बिछा बैठ, पृ० ९ से पृ० २१ तक में ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण करे और जितने वहाँ पुरुष आये हों, वे भी एकाग्रचित्त होके ईश्वर के ध्यान में मग्न होवें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान करके पृ० ३२ में लिखे प्रमाणे वेदी के चारों ओर उदक-सेचन करके आसन पर पूर्वाभिमुख आचार्य बैठके पृ० ३२ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार और पृ० ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृ० ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ और पृ० ३३ में लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् आहुति एक और प्राजापत्याहुति एक—ये सब मिलके अठारह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात् ब्रह्मचारी पृ० १०० में लिखे० (ओम् अग्ने सुश्रवः०) इस मन्त्र से कुण्ड का अग्नि कुण्ड के मध्य में इकट्ठा करे। तत्पश्चात् पृ० १०० में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्नये समिध०) इस मन्त्र
- जोकि पूर्व पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे भात आदि बनाकर रक्खा हो।