संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ संस्कारविधिः देके शुभासन पर बैठा, दही में मधु अथवा सहत न मिले तो घी मिलाके, एक अच्छे पात्र में धर इन्हें मधुपर्क देना होता है और विद्यास्नातक, व्रतस्नातक तथा विद्याव्रतस्नातक ये तीन * प्रकार के स्नातक होते हैं। इस कारण वेद की समाप्ति और अड़तालीस वर्ष का ब्रह्मचर्य समाप्त करके ब्रह्मचारी विद्याव्रत स्नान करे। तं प्रतीतं स्वधर्मेण धर्मदायहरं पितुः। स्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत् प्रथमं गवा॥ —मनु० ३।३॥ अर्थः—जो विद्वान् माता-पिता का पुत्र, शिष्य, ब्रह्मचारी हो, वह स्वधर्म से यथावत् युक्त पितृस्थानी उस आचार्य को उत्तम आसन पर बैठा, पुष्पमाला पहनाकर प्रथम गोदान देवे। यथाशक्ति वस्त्र, धनादि भी देकर सत्कार करे॥ तानि॒ कल्प॑न्द् ब्रह्म॒चारी स॑लि॒लस्य॑ पृ॒ष्ठे तपो॑ऽतिष्ठत्तप्यमा॑नः समु॒द्रे। स स्ना॒तो ब॒भ्रुः पि॑ङ्ग॒लः पृ॑थि॒व्यां ब॒हु रो॑चते॥ —अथर्व० कां० ११। प्रपा० २४। व० १६। मं० २६॥ अर्थ—जो ब्रह्मचारी समुद्र के समान गम्भीर, बड़े उत्तम व्रत—ब्रह्मचर्य में निवास कर महातप करता हुआ वेदपठन, वीर्यनिग्रह, आचार्य के प्रियाचरणादि कर्मों को पूरा कर पश्चात् पृ० १३० में लिखे अनुसार स्नानविधि करके पूर्ण विद्याओं को धरता, सुन्दर वर्णयुक्त होके पृथिवी में अनेक शुभ गुण-कर्म और स्वभाव से प्रकाशमान होता है, वही धन्यवाद के योग्य है।
- जो केवल विद्या को समाप्त तथा ब्रह्मचर्यव्रत को न समाप्त करके स्नान करता है वह विद्यास्नातक, जो ब्रह्मचर्यव्रत को समाप्त तथा विद्या को न समाप्त करके स्नान करता है, वह व्रतस्नातक और जो विद्या तथा ब्रह्मचर्यव्रत दोनों को समाप्त करके स्नान करता है, वह विद्याव्रतस्नातक कहाता है।