भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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12 अथ समावर्त्तनसंस्कारविधिं वक्ष्यामः ‘समावर्त्तन संस्कार’ उसे कहते हैं कि जिसमें ब्रह्मचर्यव्रत, साङ्गोपाङ्ग वेदविद्या, उत्तम शिक्षा और पदार्थविज्ञान को पूर्ण रीति से प्राप्त होके विवाह-विधानपूर्वक गृहाश्रम को ग्रहण करने के लिए विद्यालय को छोड़के घर की ओर आना होता है। इसमें प्रमाण— वेदसमाप्तिं वाचयीत ॥ कल्याणैः सह सम्प्रयोगः ॥ स्नातकायोपस्थिताय। राज्ञे च। आचार्यश्वशुरपितृव्य- मातुलानां च। दधनि मध्वानीय। सर्पिर्वा मध्वलाभे। विष्टरः पाद्यमर्घ्यमाचमनीयं मधुपर्कः ॥ —यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है। तथा पारस्करगृह्यसूत्र में कहा है— वेदग्ँ समाप्य स्नायाद्। ब्रह्मचर्यं वाष्टाचत्वारिंशकम्। त्रय एव स्नातका भवन्ति—विद्यास्नातको व्रतस्नातको विद्याव्रतस्नातकश्चेति ॥ अर्थः—जब वेदों की समाप्ति हो तब समावर्त्तनसंस्कार करे। सदा पुण्यात्मा पुरुषों के सब व्यवहारों में साझा रक्खे। राजा, आचार्य, श्वसुर, चाचा और मामा आदि का अपूर्वागमन जब हो और स्नातक अर्थात् जब विद्या और ब्रह्मचर्य पूर्ण करके ब्रह्मचारी घर को आवे, तब प्रथम पाद्यम्=पग धोने का जल, अर्घ्यम्=मुखप्रक्षालन के लिए जल और आचमन के लिए जल