भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

१३२ संस्कारविधिः ओम् सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयासँः सुवर्चा मुखेन। सुश्रुत् कर्णाभ्यां भूयासम् ॥ इस मन्त्र का जप करके— ओं परिधास्यै यशोधास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि । शतं च जीवामि शरदः पुरूची रायस्पोषमभिसंव्ययिष्ये ॥ इस मन्त्र से सुन्दर, अति श्रेष्ठ वस्त्र धारण करके— ओम् यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्राबृहस्पती । यशो भगश्च मा विदद् यशो मा प्रतिपद्यताम् ॥ इस मन्त्र से उत्तम उपवस्त्र धारण करके— ओं या आहरज्जमदग्निः श्रद्धायै कामायेन्द्रियाय । ता अहं प्रतिगृह्णामि यशसा च भगेन च ॥ इस मन्त्र से सुगन्धित पुष्पों की माला लेके— ओं यद्यशोऽप्सरसामिन्द्रश्चकार विप्रुं पृथु । तेन सङ्ग्रथिताः सुमनस आबध्नामि यशो मयि ॥ इस मन्त्र से धारण करनी। पुनः शिरोवेष्टन अर्थात् पगड़ी, दुपट्टा और टोपी आदि अथवा मुकुट हाथ में लेके ९६ पृष्ठ में लिखे प्रमाणे (युवा सुवासाः०) इस मन्त्र से धारण करे। उसके पश्चात् अलङ्कार लेके— ओम् अलङ्करणमसि भूयोऽलङ्करणं भूयात् ॥ इस मन्त्र से धारण करे। और— ओं वृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा असि चक्षुर्मे देहि ॥ इस मन्त्र से आँख में अञ्जन करना। तत्पश्चात्— ओं रोचिष्णुरसि ॥ इस मन्त्र से दर्पण में मुख अवलोकन करे। तत्पश्चात्— ओं बृहस्पतेश्छदिरसि पाप्मनो मामन्तर्धेहि तेजसो यशसो माऽन्तर्धेहि ॥