संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमावर्त्तनप्रकरणम् १३३ इस मन्त्र से छत्र धारण करे। पुनः— ओं प्रतिष्ठे स्थो विश्वतो मा पातम्॥ इस मन्त्र से उपानह्=पादवेष्टन=पगरखा जिसको जोड़ा भी कहते हैं, धारण करे। तत्पश्चात्— ओं विश्वाभ्यो मा नाष्ट्राभ्यस्परिपाहि सर्वतः॥ इस मन्त्र से बाँस आदि की एक सुन्दर लकड़ी हाथ में धारण करनी। तत्पश्चात् जब आचार्यकुल से अपना पुत्र घर को आवे, तब ब्रह्मचारी के माता-पिता आदि, उसे बड़े मान्य, प्रतिष्ठा, उत्सव, उत्साह से अपने घर पर ले-आवें। घर पर लाके उसके पिता-माता सम्बन्धी बन्धु आदि ब्रह्मचारी का सत्कार पृ० १४९- १५३ में लिखे प्रमाणे [पाद्य-अर्घ्य-मधुपर्क द्वारा] करें। पुनः उस संस्कार में आये हुए आचार्य आदि को उत्तम अन्न-पानादि से सत्कारपूर्वक भोजन कराके और वह ब्रह्मचारी और उसके माता-पितादि आचार्य को उत्तम आसन पर बैठा, पूर्वोक्त प्रकार मधुपर्क कर, सुन्दर पुष्पमाला, वस्त्र, गोदान, धन आदि की दक्षिणा यथाशक्ति देके, सबके सामने आचार्य के जो उत्तम गुण हों, उनकी प्रशंसा कर और विद्यादान की कृतज्ञता सबको सुनावे— 'सुनो भद्रजनो! इन महाशय आचार्य ने मुझपर बड़ा उपकार किया है, जिन्होंने मुझे पशुता से छुड़ां, उत्तम. विद्वान् बनाया है, उसका प्रत्युपकार मैं कुछ भी नहीं कर संकता। इसके बदले में अपनें आचार्य को अनेक धन्यवाद दे, नमस्कार कर, प्रार्थना करता हूँ कि जैसे आपने मुझे उत्तम शिक्षा और विद्यादान देके कृतकृत्य किया, उसी प्रकार अन्य विद्यार्थियों को भी कृतकृत्य करेंगे और जैसे आपने मुझे विद्या देके आनन्दित किया है, वैसे मैं भी अन्य विद्यार्थियों को कृतकृत्य और आनन्दित करता रहूँगा और आपके किये उपकार को कभी न भूलूँगा। सर्वशक्तिमान्