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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

13 अथ विवाहसंस्कारविधिं वक्ष्यामः 'विवाह' उसे कहते हैं कि जो पूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत द्वारा विद्या- बल को प्राप्त तथा सब प्रकार से शुभ गुण-कर्म-स्वभावों में तुल्य, परस्पर प्रीतियुक्त होके निम्नलिखित प्रमाणे सन्तानोत्पत्ति और अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुकूल उत्तम कर्म करने के लिए स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध होता है। इसमें प्रमाण— उदगयन आपूर्यमाणपक्षे पुण्ये नक्षत्रे* चौलकर्मोपनयन- गोदानविवाहाः ॥ १ ॥ सार्वकालमेके विवाहम् ॥ २ ॥ —यह आश्वलायनगृह्यसूत्र और— आवसथ्याधानं दारकाले ॥ ३ ॥ इत्यादि पारस्कर और— पुण्ये नक्षत्रे दारान् कुर्वीत ॥ ४ ॥ लक्षणप्रशस्तान् कुशलेन ॥ ५ ॥ इत्यादि गोभिलीयगृह्यसूत्र और इसी प्रकार शौनकगृह्यसूत्र में भी है॥ अर्थः—उत्तरायण शुक्लपक्ष अच्छे दिन अर्थात् जिस दिन प्रसन्नता हो, उस दिन विवाह करना चाहिए ॥ १ ॥ और कितने ही आचार्यों का ऐसा मत है कि सब काल में विवाह करना चाहिए ॥ २ ॥ जिस अग्नि का स्थापन विवाह में होता है, उसका 'आवसथ्य' नाम है ॥ ३ ॥ प्रसन्नता के दिन सर्वथा शुभ गुणादि से उत्तम जो स्त्री हो, उससे पाणिग्रहण करना चाहिए ॥ ४-५ ॥ * यह नक्षत्रादि का विचार कल्पनायुक्त है, इससे प्रमाण नहीं।