संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ संस्कारविधिः अर्थ—ब्रह्मचर्य से चार, तीन, दो अथवा एक वेद को यथावत् पढ़, अखण्डित ब्रह्मचर्य का पालन करके गृहाश्रम का धारण करे ॥ १ ॥ यथावत् उत्तम रीति से ब्रह्मचर्य और विद्या को ग्रहण कर, गुरु की आज्ञा से स्नान करके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने वर्ण की उत्तम लक्षणयुक्त स्त्री से विवाह करे ॥ २ ॥ जो स्त्री माता की छह पीढ़ी और पिता के गोत्र की न हो, वही द्विजों के लिए विवाह करने में उत्तम है ॥ ३ ॥ विवाह में नीचे लिखे हुए दश कुल, चाहे वे गाय आदि पशु, धन और धान्य से कितने ही बड़े हों, उन कुलों की कन्या के साथ विवाह न करे ॥ ४ ॥ वे दश कुल ये हैं। एक—जिस कुल में उत्तम क्रिया न हों। दूसरा—जिस कुल में कोई भी उत्तम पुरुष न हो। तीसरा—जिस कुल में कोई विद्वान् न हो। चौथा—जिस कुल में शरीर के ऊपर बड़े-बड़े लोम हों। पाँचवाँ—जिस कुल में बवासीर हो। छठा—जिस कुल में क्षयी (राज्यक्ष्मा) रोग हो। सातवाँ—जिस कुल में अग्निमन्दता से आमाशय रोग हो। आठवाँ—जिस कुल में मृगी रोग हो। नववाँ—जिस कुल में श्वेतकुष्ठ हो और दसवाँ—जिस कुल में गलितकुष्ठ आदि रोग हों—उन कुलों की कन्या अथवा उन कुलों के पुरुषों से विवाह कभी न करे ॥ ५ ॥ पीले वर्णवाली, अधिक अङ्गवाली जैसी छंगुली आदि, रोगवती, जिसके शरीर पर कुछ भी लोम न हों और जिसके शरीर पर बड़े-बड़े लोम हों, व्यर्थ अधिक बोलनेवाली और जिसके पीले बिल्ली के सदृश नेत्र हों ॥ ६ ॥ तथा जिस कन्या का (ऋक्ष) नक्षत्र पर नाम अर्थात् रेवती, रोहिणी इत्यादि, (वृक्ष) चम्पा, चमेली आदि, (नदी) जिसका गङ्गा, यमुना इत्यादि, (अन्त्य) चाण्डाली आदि, (पर्वत) जिसका विन्ध्याचला इत्यादि, (पक्षी) पक्षी पर, अर्थात् कोकिला,