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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

विवाहप्रकरणम् १३९ हंसा इत्यादि, (अहि), अर्थात् उरगा, भोगिनी इत्यादि, (प्रेष्य) दासी इत्यादि और जिस कन्या का (भीषण) कालिका, चण्डिका इत्यादि नाम हो, उससे विवाह न करे॥७॥ किन्तु जिसके सुन्दर अङ्ग, उत्तम नाम, हंस और हस्तिनी के सदृश चालवाली, जिसके सूक्ष्म लोम, सूक्ष्म केश और सूक्ष्म दाँत हों, जिसके सब अङ्ग कोमल हों, उस स्त्री से विवाह करे॥८॥ ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच, ये आठ प्रकार के विवाह होते हैं॥९॥ पहला- ब्राह्म- कन्या के योग्य सुशील, विद्वान् पुरुष का सत्कार करके कन्या को वस्त्रादि से अलंकृत करके, उत्तम पुरुष को बुला, अर्थात् जिसको कन्या ने भी पसन्द किया हो, उसको देना, वह 'ब्राह्म' विवाह कहाता है॥१०॥ दूसरा-विस्तृत यज्ञ में बड़े-बड़े विद्वानों का वरण कर, उसमें कर्म करानेवाले विद्वान् को वस्त्र-आभूषण आदि से कन्या को सुशोभित करके देना, वह 'दैव' विवाह है॥११॥ तीसरा- एक गाय, बैल का जोड़ा अथवा दो जोड़े* वर से लेके धर्मपूर्वक कन्यादान करना, वह 'आर्ष' विवाह है॥१२॥ चौथा-कन्या और वर को यज्ञशाला में विधि करके सबके सामने तुम दोनों मिलके गृहाश्रम के कर्मों को यथावत् करो, ऐसा कहकर दोनों की प्रसन्नतापूर्वक पाणिग्रहण होना, वह 'प्राजापत्य' विवाह कहाता है। ये चार विवाह उत्तम हैं॥१३॥ पाँचवाँ-वर की जातिवालों और कन्या को यथाशक्ति धन देकर होम आदि विधि कर कन्या देना, 'आसुर' विवाह

  • यह बात मिथ्या है, क्योंकि आगे मनुस्मृति में निषेध किया है और युक्तिविरुद्ध भी है, इसलिए कुछ भी न ले-देकर दोनों की प्रसन्नता से पाणिग्रहण होना आर्ष विवाह है।