भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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विवाहप्रकरणम् १४७ शूद्र और क्षत्रिय वैश्य, शूद्र तथा वैश्य शूद्र वर्ण के अधिकार और कर्मों को प्राप्त होता है॥३॥ इसी प्रकार वर्णव्यवस्था होने से पक्षपात न होकर सब वर्ण उत्तम बने रहते और उत्तम बनने में प्रयत्न करते और उत्तम वर्ण इस भय से कि मैं नीच वर्ण न हो जाऊँ, इसलिए बुरे कर्म छोड़ उत्तम कर्मों ही को किया करते हैं। इससे संसार की बड़ी उन्नति है। आर्यावर्त्त देश में जब तक ऐसी वर्णव्यवस्था और पूर्वोक्त ब्रह्मचर्य, विद्याग्रहण, उत्तमता से स्वयंवर विवाह होता था, तभी देश की उन्नति थी। अब भी ऐसा ही होना चाहिए, जिससे आर्यावर्त्त देश अपनी पूर्वावस्था को प्राप्त होकर आनन्दित होवे। अब वधू-वर एक-दूसरे के गुण-कर्म और स्वभाव की परीक्षा इस प्रकार करें— दोनों का तुल्य शील, समान बुद्धि, समान आचार, समान रूपादि गुण, अहिंसकता, सत्य, मधुर भाषण, कृतज्ञता, दयालुता, निर्लोभता, देश का सुधार, विद्याग्रहण, सत्योपदेश करने में निर्भयता, उत्साह, अहंकार, मत्सर, ईर्ष्या, काम-क्रोध, कपट, द्यूत, चोरी, मद्यमांसाहारादि दोषों का त्याग, गृह्य-कार्यों में अति चतुरता हो। जब-जब प्रातःसायं वा परदेश से आकर मिलें, तब-तब 'नमस्ते' इस वाक्य से परस्पर नमस्कार कर, स्त्री पति के चरणस्पर्श, पादप्रक्षालन आसनदान करे तथा दोनों परस्पर प्रेम बढ़ानेहारे वचनादि व्यवहारों से वर्त्तकर आनन्द भोगें। वर के शरीर से स्त्री का शरीर पतला और पुरुष के स्कन्धे के तुल्य स्त्री का शिर होना चाहिए। तत्पश्चात् भीतर की परीक्षा स्त्री-पुरुष वचनादि-व्यवहारों से करें। ओम् ऋतमग्रे प्रथमं जज्ञ ऋते सत्यं प्रतिष्ठितम्। यदियं कुमार्य्यभिजाता तदियमिह प्रतिपद्यताम्। यत्सत्यं तद् दृश्यताम्॥