भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

१४८ संस्कारविधिः अर्थ—जब विवाह करने का समय निश्चय हो चुके, तब कन्या चतुर पुरुषों से वर की और वर चतुर स्त्रियों से कन्या की परोक्ष में परीक्षा करावे। पश्चात् उत्तम विद्वान् स्त्री-पुरुषों की सभा करके दोनों परस्पर संवाद करें कि—"हे स्त्री वा हे पुरुष ! इस जगत् के पूर्व ऋत—यथार्थस्वरूप महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ था और उस महत्तत्त्व में सत्य, त्रिगुणात्मक, नाशरहित प्रकृति प्रतिष्ठित है। जैसे पुरुष और प्रकृति के योग से सब विश्व उत्पन्न हुआ है, वैसे मैं कुमारी और मैं कुमार पुरुष इस समय में दोनों विवाह करने की सत्य प्रतिज्ञा करती वा करता हूँ। उसको यह कन्या और मैं वर प्राप्त होवें और अपनी प्रतिज्ञा को सत्य करने के लिए दृढ़ोत्साही रहें॥" विधि—जब कन्या रजस्वला होकर पृष्ठ ४१-४२ में लिखे प्रमाणे शुद्ध हो जाए, तब जिस दिन गर्भाधान की रात्रि निश्चित की हो, उस रात्रि में विवाह करने के लिए प्रथम ही सब सामग्री जोड़ रखनी चाहिए और पृष्ठ २२-२८ में लिखे प्रमाणे यज्ञशाला, वेदी, ऋत्विक्, यज्ञपात्र, शाकल्य आदि सब सामग्री शुद्ध करके रखनी उचित है। पश्चात्* एक घण्टेमात्र रात्रि जाने पर— ओं काम वेद ते नाम मदो नामासि समानयामुँः सुरा ते अभवत्। परमत्र जन्माग्रे तपसो निर्मितोऽसि स्वाहा ॥ १ ॥ ओम् इमं त उपस्थं मधुना सँसृजामि प्रजापतेर्मुखमेतत् द्वितीयम्। तेन पुँसोभिभवासि सर्वानवशान्वशिन्यसि राज्ञि स्वाहा ॥ २ ॥ ओम् अग्निं क्रव्यादमकृन्वन् गुहानाः स्त्रीणामुपस्थमृषयः पुराणाः। तेनाज्यकृण्वँस्त्रै शुङ्गं त्वाष्ट्रं त्वयि तद्दधातु स्वाहा ॥ ३ ॥ * यदि आधी रात तक विधि पूरा न हो सके तो मध्याह्नोत्तर आरम्भ कर देवे कि जिससे मध्यरात्रि तक विवाह विधि पूरा हो जावे।