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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

विवाहप्रकरणम् १४९ इन मन्त्रों से सुगन्धित शुद्ध जल से पूर्ण कलशों को लेके वधू और वर स्नान कर, पश्चात् वधू उत्तम वस्त्रालङ्कार धारण करके उत्तम आसन पर पूर्वाभिमुख बैठे। तत्पश्चात् पृष्ठ ९ से २१ तक लिखे प्रमाणे ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण करें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान, पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक आदि यथोक्त कर वेदी के समीप रक्खें। वैसे ही वर भी अपने एकान्त घर में जाके उत्तम वस्त्रालङ्कार धारण करके, यज्ञशाला में आ, उत्तमासन पर पूर्वाभिमुख बैठके पृष्ठ ९-१२ में लिखे प्रमाणे ईश्वरस्तुति-प्रार्थनोपासना* कर वधू के घर को जाने का ढंग करे। तत्पश्चात् कन्या और वरपक्ष के पुरुष बड़े सम्मान से वर को घर ले-जावें। जिस समय वर वधू के घर में प्रवेश करे, उसी समय वधू और कार्यकर्त्ता मधुपर्क आदि से वर का निम्नलिखित प्रकार से आदर-सत्कार करें। उसकी रीति यह है कि वर-वधू के घर में प्रवेश करके पूर्वाभिमुख खड़ा रहे और वधू तथा कार्यकर्त्ता वर के समीप उत्तराभिमुख खड़े रहके, वधू और कार्यकर्त्ता— साधु भवानास्तामर्चयिष्यामो भवन्तम्॥ इस वाक्य को बोलें। उसपर वर— ओम् अर्चय॥ ऐसा प्रत्युत्तर देवे। पुनः वधू और कार्यकर्त्ता ने वर के लिए जो उत्तम आसन सिद्ध कर रक्खा हो, उसे वधू हाथ में लेकर आगे खड़ी रहके— ओं विष्टरो विष्टरो विष्टरः प्रतिगृह्यताम्॥

  • विवाह में आये हुए स्त्री-पुरुष भी एकाग्रचित्त, ध्यानावस्थित होके इन तीन कर्मों के अनुसार ईश्वर का चिन्तन किया करें।