संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० संस्कारविधिः यह उत्तम आसन है, आप ग्रहण कीजिए। वर— ओम् प्रतिगृह्णामि ॥ इस वाक्य को बोलके वधू के हाथ से आसन ले, बिछा, उसपर सभामण्डप में पूर्वाभिमुख बैठके, वर— ओं वर्ष्मोऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूर्यः। इमं तमभितिष्ठामि यो मा कश्चाभिदासति ॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सुन्दर पात्र में पूर्ण जल भरके कन्या के हाथ में देवे और कन्या— ओं पाद्यं पाद्यं पाद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ इस वाक्य को बोलके वर के आगे धरे। पुनः वर— ओम् प्रतिगृह्णामि ॥ इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से उदक ले पग*— प्रक्षालन करे और उस समय— ओं विराजो दोहोऽसि विराजो दोहमशीय मयि पाद्यायै विराजो दोहः ॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता दूसरा शुद्ध लोटा पवित्र जल से भर कन्या के हाथ में देवे पुनः कन्या— ओम् अर्घोऽर्घोऽर्घः प्रतिगृह्यताम् ॥ इस वाक्य को बोलके वर के हाथ में देवे और वर— ओं प्रतिगृह्णामि ॥ इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से जलपात्र लेके
- यदि घर का प्रवेशक द्वार पूर्वाभिमुख हो तो वर उत्तराभिमुख और वधू तथा कार्यकर्त्ता पूर्वाभिमुख खड़े रहके यदि ब्राह्मण वर्ण हो तो प्रथम दक्षिण पग पश्चात् बायाँ और अन्य क्षत्रियादि वर्ण हों तो प्रथम बायाँ पग धोवे पश्चात् दाहिना।