संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरणम् १५१ उससे मुखप्रक्षालन करे और उसी समय मुख धोके वर— ओम् आप स्थ युष्माभिः सर्वान् कामानवाप्नवानि ॥ १ ॥ ओं समुद्रं वः प्रहिणोमि स्वां योनिमभिगच्छत । अरिष्टास्माकं वीरा मा परासेचि मत्पयः ॥ २ ॥ इन मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात् वेदी के पश्चिम में बिछाये हुए उसी शुभासन पर पूर्वाभिमुख बैठे। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सुन्दर उपपात्र जल से पूर्ण भर, उसमें आचमनी रख, कन्या के हाथ में देवे और उस समय कन्या— ओम् आचमनीयमाचमनीयमाचमनीयं प्रतिगृह्यताम् ॥ इस वाक्य को बोलके वर के सामने करे और वर— ओं प्रतिगृह्णामि ॥ इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ में से जलपात्र को ले, सामने धर, उसमें से दाहिने हाथ में जल, जितना अंगुलियों के मूल तक पहुँचे उतना लेके, वर— ओम् आमागन् यशसा सँसृज वर्चसा । तं मा कुरु प्रियं प्रजानामधिपतिं पशूनामरिष्टिं तनूनाम् ॥ इस मन्त्र से एक आचमन । इसी प्रकार दूसरी और तीसरी बार इसी मन्त्र को पढ़के दूसरा और तीसरा आचमन करे। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता मुधपर्क* का पात्र कन्या के हाथ में देवे और कन्या— ओं मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम् ॥
- मधुपर्क उसको कहते हैं जो दही में घी वा शहद मिलाया जाता है। उसका परिमाण १२ (बारह) तोले दही में ४ (चार) तोले शहद अथवा ४ (चार) तोले घी मिलाना चाहिए, और यह मधुपर्क कांसे के पात्र में होना उचित है।