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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

विवाहप्रकरणम् १५३ इस मन्त्र से दक्षिण दिशा। ओम् आदित्यास्त्वा जागतेन च्छन्दसा भक्षयन्तु॥ इस मन्त्र से पश्चिम दिशा, और— ओं विश्वे त्वा देवा आनुष्टुभेन च्छन्दसा भक्षयन्तु॥ इस मन्त्र से उत्तर दिशा में थोड़ा-थोड़ा छोड़े, अर्थात् छींटे देवे। ओं भूतेभ्यस्त्वा परिगृह्णामि॥ इस मन्त्रस्थ वाक्य को बोलके पात्र के मध्य भाग में से लेके ऊपर की ओर तीन बार फेंकना। तत्पश्चात् उस मधुपर्क के तीन भाग करके तीन काँसे के पात्रों में धर, भूमि में अपने सम्मुख तीनों पात्र रक्खे। रक्खे— ओं यन्मधुनो मधव्यं परमं रूपमन्नाद्यम्। तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण रूपेणान्नाद्येन परमो मधव्योऽन्नादोऽसानि॥ इस मन्त्र को एक-एक बार बोलके एक-एक भाग में से वर थोड़ा-थोड़ा प्राशन करे वा सब प्राशन करे। जो उन पात्रों में शेष उच्छिष्ट मधुपर्क रहा हो, वह किसी अपने सेवक को देवे वा जल में डाल देवे। तत्पश्चात्— ओम् अमृतापिधानमसि स्वाहा॥ ओं सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा॥ इन दो मन्त्रों से दो आचमन, अर्थात् एक से एक और दूसरे से दूसरा वर करे। तत्पश्चात् वर पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे चक्षुरादि इन्द्रियों का जल से स्पर्श करे। पश्चात् कन्या— ओं गौर्गौर्गौः प्रतिगृह्यताम्॥ इस वाक्य से वर की विनती करके अपनी शक्ति के योग्य वर. को गोदानादि द्रव्य, जोकि वर के योग्य हो, अर्पण करे और वर— ओं प्रतिगृह्णामि॥