भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 158

१५४ संस्कारविधिः इस वाक्य से उसको ग्रहण करे। इस प्रकार मधुपर्क विधि यथावत् करके, वधू और कार्यकर्त्ता वर को सभामण्डपस्थान* से घर में ले-जाके शुभ आसन पर पूर्वाभिमुख बैठाके, वर के सामने पश्चिमाभिमुख वधू को बैठावे और कार्यकर्त्ता उत्तराभिमुख बैठके— ओम् अमुक¹ गोत्रोत्पन्नामिमाममुकनाम्नीम्² अलङ्कृतां कन्यां प्रतिगृह्णातु भवान्॥ इस प्रकार बोलके वर का हाथ चत्ता, अर्थात् हथेली ऊपर रखके, उसके हाथ में वधू का दक्षिण हाथ चत्ता ही रखना, और वर— ओम् प्रतिगृह्णामि॥ ऐसा बोलके— ओं जरां गच्छ परिधत्स्व वासो भवा कृष्टीनामभि- शस्तिपावा। शतं च जीव शरदः सुवर्चा रयिं च पुत्राननुसंव्ययस्वा- युष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥ इस मन्त्र को बोलके वधू को उत्तम वस्त्र देवे। तत्पश्चात्— ओं या अकृन्तन्नवयन् या अतन्वत याश्च देवीस्तन्तूनभितो ततन्थ। तास्त्वा देवीर्जरसे संव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥ इस मन्त्र को बोलके वधू को वर उपवस्त्र देवे। वह उपवस्त्र

  • ·यदि सभामण्डप स्थापन न किया हो तो जिस घर में मधुपर्क हुआ हो उससे दूसरे घर में वर को ले-जावे। १. अमुक इस पद के स्थान में जिस गोत्र और कुल में वधू उत्पन्न हुई हो उसका उच्चारण अर्थात् उसका नाम लेना। २. ‘‘अमुकनाम्नीम्’’ इस स्थान पर वधू का नाम द्वितीया विभक्ति के एकवचन से बोलना।