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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

विवाहप्रकरणम् १५५ को यज्ञोपवीतवत् धारण करे। ओं परिधास्यै यशोधास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः पुरूची रायस्पोषमभिसंव्ययिष्ये॥ इस मन्त्र को पढ़के वर आप अधोवस्त्र धारण करे और— ओं यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्राबृहस्पती। यशो भगश्च मा विन्दद्धाशो मा प्रतिपद्यताम्॥ इस मन्त्र को पढ़के द्विपट्टा धारण करे। इस प्रकार वधू वस्त्र-परिधान करके जबतक सँभले, तबतक कार्यकर्त्ता अथवा दूसरा कोई यज्ञमण्डप में जा कुण्ड के समीपस्थ हो पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे ईंधन और कर्पूर वा घृत से कुण्ड की अग्नि को प्रदीप्त करे और आहुति के लिए सुगन्ध डाला हुआ घी बटलोई में करके कुण्ड की अग्नि पर गरम कर, कांसे के पात्र में रक्खे और स्रुवादि होम के पात्र तथा जलपात्र इत्यादि सामग्री यज्ञकुण्ड के समीप जोड़कर रक्खे। और वरपक्ष का एक पुरुष शुद्ध वस्त्र धारण कर, शुद्ध जल से पूर्ण एक कलश को लेके यज्ञकुण्ड की परिक्रमा कर, कुण्ड के दक्षिणभाग में उत्तराभिमुख हो कलशस्थापन, अर्थात् भूमि पर अच्छे प्रकार अपने आगे धरके जबतक विवाह का कृत्य पूर्ण न हो जाए, तबतक उत्तराभिमुख बैठा रहे। और उसी प्रकार वर के पक्ष का दूसरा पुरुष हाथ में दण्ड लेके कुण्ड के दक्षिणभाग में कार्य-समाप्ति-पर्यन्त उत्तराभिमुख बैठा रहे। और इसी प्रकार सहोदर वधू का भाई अथवा सहोदर न हो तो चचेरा भाई, मामा का पुत्र अथवा जो मौसी का लड़का हो, वह चावल वा ज्वार की धाणी और शमी वृक्ष के सूखे पत्ते इन दोनों को मिलाकर शमीपत्रयुक्त धाणी की चार अञ्जलि