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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

विवाहप्रकरणम् १५५ को यज्ञोपवीतवत् धारण करे। ओं परिधास्यै यशोधास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः पुरूची रायस्पोषमभिसंव्ययिष्ये॥ इस मन्त्र को पढ़के वर आप अधोवस्त्र धारण करे और— ओं यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्राबृहस्पती। यशो भगश्च मा विन्दद्धाशो मा प्रतिपद्यताम्॥ इस मन्त्र को पढ़के द्विपट्टा धारण करे। इस प्रकार वधू वस्त्र-परिधान करके जबतक सँभले, तबतक कार्यकर्त्ता अथवा दूसरा कोई यज्ञमण्डप में जा कुण्ड के समीपस्थ हो पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे ईंधन और कर्पूर वा घृत से कुण्ड की अग्नि को प्रदीप्त करे और आहुति के लिए सुगन्ध डाला हुआ घी बटलोई में करके कुण्ड की अग्नि पर गरम कर, कांसे के पात्र में रक्खे और स्रुवादि होम के पात्र तथा जलपात्र इत्यादि सामग्री यज्ञकुण्ड के समीप जोड़कर रक्खे। और वरपक्ष का एक पुरुष शुद्ध वस्त्र धारण कर, शुद्ध जल से पूर्ण एक कलश को लेके यज्ञकुण्ड की परिक्रमा कर, कुण्ड के दक्षिणभाग में उत्तराभिमुख हो कलशस्थापन, अर्थात् भूमि पर अच्छे प्रकार अपने आगे धरके जबतक विवाह का कृत्य पूर्ण न हो जाए, तबतक उत्तराभिमुख बैठा रहे। और उसी प्रकार वर के पक्ष का दूसरा पुरुष हाथ में दण्ड लेके कुण्ड के दक्षिणभाग में कार्य-समाप्ति-पर्यन्त उत्तराभिमुख बैठा रहे। और इसी प्रकार सहोदर वधू का भाई अथवा सहोदर न हो तो चचेरा भाई, मामा का पुत्र अथवा जो मौसी का लड़का हो, वह चावल वा ज्वार की धाणी और शमी वृक्ष के सूखे पत्ते इन दोनों को मिलाकर शमीपत्रयुक्त धाणी की चार अञ्जलि

१५६ संस्कारविधिः एक शुद्ध सूप में रखके धाणीसहित सूप लेके यज्ञकुण्ड के पश्चिमभाग में पूर्वाभिमुख बैठा रहे। तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सपाट शिला, जोकि सुन्दर, चिकनी हो उसको तथा वधू और वर को कुण्ड के समीप बैठाने के लिए दो कुशासन वा यज्ञिय तृणासन अथवा यज्ञिय वृक्ष की छाल के जोकि प्रथम से सिद्ध कर रक्खे हों, उन आसनों को रखवावे। तत्पश्चात् वस्त्र धारण की हुई कन्या को कार्यकर्त्ता वर के सम्मुख लावे और उस समय वर और कन्या— ओं सम॑ञ्जन्तु विश्वे॑ दे॒वाः समापो॒ हृदया॑नि नौ। सं मा॒तरि॑श्वा सं धा॒ता समु॑ दे॒ष्ट्री द॑धातु नौ*॥ इस मन्त्र को बोलें। तत्पश्चात् वर अपने दक्षिण हाथ से वधू का दक्षिण हाथ पकड़के—

  • वर और कन्या बोलें कि हे (विश्वेदेवाः) इस यज्ञशाला में बैठे हुए विद्वान् लोगो ! आप हम दोनों को (समञ्जन्तु) निश्चय करके जानें कि हम अपनी प्रसन्नतापूर्वक गृहाश्रम में एकत्र रहने के लिए एक दूसरे का स्वीकार करते हैं, कि (नौ) हमारे दोनों के (हृदयानि) हृदय (आपः) जल के समान (सम्) शान्त और मिले हुए रहेंगे। जैसे (मातरिश्वा) प्राणवायु हमको प्रिय है वैसे (सम्) हम दोनों एक दूसरे से सदा प्रसन्न रहेंगे। जैसे (धाता) धारण करनेहारा परमात्मा सबमें (सम्) मिला हुआ सब जगत् को धारण करता है, वैसे हम दोनों एक दूसरे को धारण करेंगे। जैसे (समुदेष्ट्री) उपदेश करनेहारा श्रोताओं से प्रीति करता है वैसे (नौ) हमारे दोनों का आत्मा एक-दूसरे के साथ दृढ़ प्रेम को (दधातु) धारण करे॥ १ ॥

विवाहप्रकरणम् १५७ ओं यदैषि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा। हिरण्यपर्णो वैकर्णः स त्वा मन्मनसां करोतु* असौ॥ इस मन्त्र को बोलके, उसको लेके घर के बाहर मण्डपस्थान में कुण्ड के समीप हाथ पकड़े हुए वधू तथा वर दोनों आवें और वर निम्न दो मन्त्रों को बोले— ओं भूर्भुवः॒ स्वः॑। अघोर॑च॒क्षुरप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑। वी॒रसूर्देवृ॑कामा स्यो॒ना शं नौ॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे ∞ ॥

  • (असौ) इस पद के स्थान में कन्या का नाम उच्चारण करना। हे वरानने वा हे वरानन! (यत्) जो तू (मनसा) अपनी इच्छा से मुझको जैसे (पवमानः) पवित्र वायु (वा) जैसे (हिरण्यपर्णो वैकर्णः) तेजोमय जल आदि को किरणों से ग्रहण करनेवाला सूर्य (दूरम्) दूरस्थ पदार्थों और (दिशोऽनु) दिशाओं को प्राप्त होता है, वैसे तू प्रेमपूर्वक अपनी इच्छा से मुझको प्राप्त होती वा होता है, उस (त्वा) तुझको (सः) वह परमेश्वर (मन्मनसाम्) मेरे मन के अनुकूल (करोतु) करे, और हे (वीर) जो आप मन से मुझको (ऐषि) प्राप्त होते हो उस आपको जगदीश्वर मेरे मन के अनुकूल सदा रक्खे ॥ २॥ ∞ हे वरानने (अपतिघ्नि) पति से विरोध न करनेहारी तू जिसके (ओम्) अर्थात् रक्षा करनेवाला (भूः) प्राणदाता (भुवः) सब दुःखों को दूर करनेहारा (स्वः) सुखस्वरूप और सब सुखों के दाता आदि नाम हैं, उस परमात्मा की कृपा और अपने उत्तम पुरुषार्थ से (अघोरचक्षुः) प्रियदृष्टि (एधि) हो, (शिवा) मंगल करनेहारी (पशुभ्यः) सब पशुओं को सुखदाता, (सुमनाः) पवित्रान्तःकरणयुक्त, प्रसन्नचित्त, (सुवर्चाः) सुन्दर शुभ, गुण, कर्म, स्वभाव और विद्या से सुप्रकाशित, (वीरसूः) उत्तम वीर पुरुषों

१५८ संस्कारविधिः ओं भूर्भुवः स्वः। सा नः पूषा शिवतमामैरय सा न ऊरू उशती विहर। यस्यामुशन्तः प्रहराम शेफं यस्यामु कामा बहवो निविष्ट्यै॥ इन दो मन्त्रों को वर बोलके, दोनों वर-वधू यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, कुण्ड के पश्चिम भाग में प्रथम स्थापन किये हुए आसन पर पूर्वाभिमुख वर के दक्षिण-भाग में वधू और वधू के वाम-भाग में वर बैठके, वधू— ओं प्र मे पतियानः पन्था कल्पताथं शिवा अरिष्टा पतिलोकं गमेयम्॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड के समीप दक्षिणभाग में उत्तराभिमुख पुरोहित की स्थापना करनी। तत्पश्चात् पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा) इत्यादि तीन मन्त्रों में प्रत्येक मन्त्र से एक-एक आचमन, वैसे तीन आचमन वर-वधू और पुरोहित और कार्यकर्त्ता करके, हस्त और मुख-प्रक्षालन एक शुद्धपात्र में करके दूर रखवा दें। हाथ और मुख पोंछके पृ० ३० में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड में (ओं भूर्भुवः स्वद्यौरिव०) इस मन्त्र से अग्न्याधान पृ० ३१ में लिखे प्रमाणे (ओम् अयन्त इध्म०) इत्यादि मन्त्रों से समिदाधान और पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि तीन मन्त्रों से कुण्ड के तीन ओर और (ओं देव सवितः प्रसुव०) इस मन्त्र से कुण्ड की चारों ओर दक्षिण हाथ की अञ्जलि से शुद्ध जल सेचन करके, कुण्ड में डाली हुई समिधा प्रदीप्त को उत्पन्न करनेहारी (देवृकामाः) देवर की कामना करती हुई, अर्थात् नियोग की भी इच्छा करनेहारी, (स्योना) सुखयुक्त होके (नः) हमारे (द्विपदे) मनुष्यादि के लिए (शम्) सुख करनेहारी (भव) सदा हो, और (चतुष्पदे) गाय आदि पशुओं को भी (शम्) सुख देनेहारी हो, वैसे ही मैं तेरा पति भी वर्त्ता करूँ॥३॥

विवाहप्रकरणम् १५९ हुए पश्चात् पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे वधू-वर पुरोहित और कार्यकर्त्ता आघारावाज्यभागाहुति चार घी की देवें। तत्पश्चात् पृ० ३२-३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार घी की और पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ, ये सब मिलके १६ सोलह आज्याहुति देके प्रधान होम का प्रारम्भ करें। प्रधान होम के समय वधू अपने दक्षिण हाथ को वर के दक्षिण स्कन्धे पर स्पर्श करके पृ० ३४ में लिखे प्रमाणे (ओम् भूर्भुवः स्वः। अग्न आयूंषि०) इत्यादि चार मन्त्रों से, अर्थात् एक-एक से एक-एक मिलके चार आज्याहुति क्रम से करें और— ओं भूर्भुव॒: स्व॒:। त्वम॑र्य॒मा भ॑वसि॒ यत्क॒नीनां॒ नाम॑ स्व॒धाव॑न्गुह्यं॑ बिभर्षि। अ॒ञ्जन्ति॑ मि॒त्रं सुधि॑तं॒ न गोभि॒र्यद्दम्प॑ती सम॑नसा कृ॒णोषि॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये— इदन्न मम ॥ इस मन्त्र को बोलके पाँचवीं आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्— ओम् ऋ॒ताषाड् ऋ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वः। स न॑ इदं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ॥ इदमृताषाहे ऋतधाम्नेऽग्नये गन्धर्वाय—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओम् ऋ॒ताषाड् ऋ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वस्तस्यौषधयोऽप्स॒रसो॑ मुदो॒ नाम॑। ताभ्य॒: स्वाहा॑ ॥ इदमोषधिभ्योऽप्सरोभ्यो मुद्भ्यः—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओं सं॒हितो वि॒श्वसा॑मा॒ सूर्यो॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इदं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ॥ इदं संहिताय विश्वसाम्ने सूर्याय गन्धर्वाय—इदन्न मम ॥ ३ ॥

१६० संस्कारविधिः ओँ सँꣳहि॒तो वि॒श्वसा॑मा॒ सूर्यो॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॑ मरी॑चयोऽ प्स॒रस॑ आ॒युवो॒ नाम॑। ताभ्य॒ स्वाहा॑। इदं मरीचिभ्योऽ प्सरोभ्य आयुभ्यः-इ॒दन्न म॒म॥४॥ ओँ सु॒षुम्णः सूर्य॑रश्मिश्च॒न्द्रमा॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदं सुषुम्णाय सूर्यरश्मये चन्द्रमसे गन्धर्वाय-इ॒दन्न म॒म॥५॥ ओँ सु॒षुम्णः सूर्य॑रश्मिश्च॒न्द्रमा॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॑ नक्ष॑त्राण्यप्स॒रसौ भेकु॒रयो॒ नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदं नक्षत्रेभ्योऽप्सरोभ्यो भेकुरिभ्यः-इ॒दन्न म॒म॥६॥ ओम् इ॑षि॒रो वि॒श्वव्य॑चा॒ वातो॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदमषिराय विश्वव्यचसे वाताय गन्धर्वाय-इ॒दन्न म॒म॥७॥ ओम् इ॑षि॒रो वि॒श्वव्य॑चा॒ वातो॑ गन्ध॒र्वस्तस्यापो॑ अ॒प्स॒रस॒ ऊर्जा॒ नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदमद्भ्योऽप्सरोभ्यऽ- ऊर्गभ्यः-इ॒दन्न म॒म॥८॥ ओँ भु॒ज्युः सु॑प॒र्णो य॒ज्ञो ग॑न्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदं भुज्यवे सुपर्णाय यज्ञाय गन्धर्वाय-इ॒दन्न म॒म॥९॥ ओँ भु॒ज्युः सु॑प॒र्णो य॒ज्ञो ग॑न्ध॒र्वस्तस्य॒ दक्षि॑णा अ॒प्स॒रस॑ स्ता॒वा नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदं दक्षिणाभ्योऽप्सरोभ्यः स्तावाभ्यः-इ॒दन्न म॒म॥१०॥

विवाहप्रकरणम् १६१ ओं प्र॒जाप॑तिर्वि॒श्वक॑र्मा मनो॑ गन्ध॒र्वः । स न॑ इदं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ॥ इदं प्रजापतये विश्वकर्मणे मनसे गन्धर्वाय—इदन्न मम ॥ ११ ॥ ओं प्र॒जाप॑तिर्वि॒श्वक॑र्मा मनो॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॑ ऋक्सामान्य॑प्स॒रस॑ ए॒ष्टयो॒ नाम॑ । ताभ्यः स्वाहा॑ ॥ इदमृक्सामे- भ्योऽप्सरोभ्य एष्टिभ्यः—इदन्न मम ॥ १२ ॥ इन बारह मन्त्रों से बारह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात् जयाहोम करना— ओं चित्तं च स्वाहा ॥ इदं चित्ताय—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओं चित्तिश्च स्वाहा ॥ इदं चित्त्यै—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओम् आकृतं च स्वाहा ॥ इदमाकूताय—इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओम् आकृतिश्च स्वाहा ॥ इदमाकृत्यै—इदन्न मम ॥ ४ ॥ ओं विज्ञातं च स्वाहा ॥ इदं विज्ञाताय—इदन्न मम ॥ ५ ॥ ओं विज्ञातिश्च स्वाहा ॥ इदं विज्ञात्यै—इदन्न मम ॥ ६ ॥ ओं मनश्च स्वाहा ॥ इदं मनसे—इदन्न मम ॥ ७ ॥ ओं शक्करीश्च स्वाहा ॥ इदं शक्करीभ्यः—इदन्न मम ॥ ८ ॥ ओं दर्शश्च स्वाहा ॥ इदं दर्शाय—इदन्न मम ॥ ९ ॥ ओं पौर्णमासं च स्वाहा ॥ इदं पौर्णमासाय—इदन्न मम ॥ १० ॥ ओं वृहच्च स्वाहा ॥ इदं बृहते—इदन्न मम ॥ ११ ॥ ओं रथन्तरं च स्वाहा ॥ इदं रथन्तराय—इदन्न मम ॥ १२ ॥ ओं प्रजापतिर्जयानिन्द्राय वृष्णो प्रायच्छदुग्रः पृतना जयेषु। तस्मै विशः समनमन्त सर्वाः स उग्रः स इ ह॒व्यो बभूव स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये जयानिन्द्राय— इदन्न मम ॥ १३ ॥

१६२ संस्कारविधिः इन मन्त्रों से प्रत्येक से एक-एक करके जयाहोम की तरह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात् अभ्यातान होम करना। इसके मन्त्र ये हैं— ओम् अग्निर्भूतानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदमग्नये भूतानामधिपतये-इदन्न मम ॥ १ ॥ ओम् इन्द्रो ज्येष्ठानामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदमिन्द्राय ज्येष्ठानामधिपतये-इदन्न मम ॥ २ ॥ ओं यमः पृथिव्याऽधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं यमाय पृथिव्यां अधिपतये-इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओं वायुरन्तरिक्षस्याधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं वायवे अन्तरिक्षस्याधिपतये-इदन्न मम ॥ ४ ॥ ओं सूर्यो दिवोऽधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं सूर्याय दिवोऽधिपतये-इदन्न मम ॥ ५ ॥ ओं चन्द्रमा नक्षत्राणामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं चन्द्रमसे नक्षत्राणामधिपतये-इदन्न मम ॥ ६ ॥ ओं बृहस्पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं बृहस्पतये ब्रह्मणोऽधिपतये-इदन्न मम ॥ ७ ॥

विवाहप्रकरणम् १६३ ओं मित्रः सत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं मित्राय सत्यानामधिपतये–इदन्न मम॥८॥ ओं वरुणोऽपामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं वरुणायापामधिपतये–इदन्न मम॥९॥ ओं समुद्रः स्रोत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षेत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं समुद्राय स्रोत्यानामधिपतये–इदन्न मम॥१०॥ ओम् अन्नꣳ साम्राज्यानामधिपतिस्तन्मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षेत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदमन्नाय साम्राज्यानामधिपतये–इदन्न मम॥११॥ ओं सोमऽओषधीनामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं सोमाय ओषधीनामधिपतये–इदन्न मम॥१२॥ ओं सविता प्रसवानांमधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षेत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं सवित्रे प्रसवानांमधिपतये–इदन्न मम॥१३॥ ओं रुद्रः पशूनामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं रुद्राय पशूनामधिपतये–इदन्न मम॥१४॥

१६४ संस्कारविधिः ओं त्वष्टा रूपाणामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं त्वष्ट्रे रूपाणामधिपतये—इदन्न मम ॥ १५ ॥ ओं विष्णुः पर्वतानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्य- स्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं विष्णवे पर्वतानामधिपतये—इदन्न मम ॥ १६ ॥ ओं मरुतो गणानामधिपतयस्ते मावन्त्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं मरुद्भ्यो गणानामधिपतिभ्यः—इदन्न मम ॥ १७ ॥ ओं पितरः पितामहाः परेऽवरे ततास्ततामहा इह मावन्त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधा- यामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं पितृभ्यः पितामहेभ्यः परेभ्योऽवरेभ्यस्ततेभ्यस्ततामहेभ्यश्च—इदन्न मम ॥ १८ ॥ इस प्रकार अभ्यातन होम की अठारह आज्याहुति दिये पीछे, पुनः— ओम् अग्निरैतु प्रथमो देवतानाꣳ सोऽस्यै प्रजां मुञ्चतु मृत्युपाशात्। तदयꣳ राजा वरुणोऽनुमन्यतां यथेयꣳ स्त्री पौत्रमघन्न रोदात् स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओम् इमामग्निस्त्रायतां गार्हपत्यः प्रजामस्यै नयतु दीर्घमायुः। अशून्योपस्था जीवतामस्तु माता पौत्रमानन्द- मभिविबुध्यतामियꣳ स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओम् स्वस्ति नोऽग्ने दिवा पृथिव्या विश्वानि धेह्ययथा यजत्र। यदस्यां मयि दिवि जातं प्रशस्तं तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रꣳ स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ३ ॥

विवाहप्रकरणम् १६५ ओं सुगन्नु पन्थां प्रदिशन्न एहि ज्योतिष्मध्ये ह्यजरन्नऽ आयुः। अपैतु मृत्युरमृतं म आगाद् वैवस्वतो नोऽअभयं कृणोतु स्वाहा ॥ इदं वैवस्वताय—इदन्न मम ॥४॥ ओं परं मृत्योऽअनु परेहि पन्थां यत्र नोऽअन्य इतरो देवयानात्। चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजा ँ रीरिषो मोत वीरान्स्वाहा ॥ इदं मृत्यवे—इदन्न मम ॥ ५ ॥ ओं द्यौस्ते पृष्ठ ँ रक्षतु वायुरूरू अश्विनौ च। स्तनन्धयस्ते पुत्रान्सविताभिरक्षत्वावाससः परिधानाद् बृहस्पतिर्विश्वे देवा अभिरक्षन्तु पश्चात्स्वाहा ॥ इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यः—इदन्न मम ॥ ६ ॥ ओं मा ते गृहेषु निशि घोष उत्थादन्यत्र त्वद् रुदत्यः संविशन्तु मा त्व ँ रुदत्युरऽआवधिष्ठा जीवपत्नी पतिलोके विराज पश्यन्ती प्रजा ँ सुमनस्यमाना ँ स्वाहा ॥ इदमग्नये— इदन्न मम ॥ ७ ॥ ओम् अप्रजस्यं पौत्रमर्त्यपाप्मानमुत वाऽअघम्। शीर्ष्णः स्रजमिवोन्मुच्य द्विषद्भ्यः प्रतिमुञ्चामि पाश ँ स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ८ ॥ इन प्रत्येक मन्त्रों से एक-एक आहुति करके आठ आज्याहुति दीजिए। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से चार आज्याहुति दीजिए। ऐसे होम करके वर आसन से उठ, पूर्वाभिमुख बैठी वधू के सम्मुख पश्चिमाभिमुख खड़ा रहकर अपने वामहस्त से वधू का दाहिना हाथ चत्ता धरके ऊपर को उचाना और अपने दक्षिण हाथ से वधू की उठाई हुई दक्षिण हस्ताञ्जलि को अंगुष्ठसहित चत्ती ग्रहण करके, वर—

१६६ संस्कारविधिः ओं गृ॒भ्णामि॑ ते सौभग॒त्वाय॒ हस्तं॒ मया॒ पत्या॑ ज॒रद॑ष्टि॒र्यथास॑ः । भगो॑ अ॒र्य॒मा स॑वि॒ता पुर॑न्धि॒र्मह्यं॑ त्वादु॒र्गार्ह॑पत्याय दे॒वाः * ॥ १ ॥ ओं भग॑स्ते॒ हस्त॑मग्रभीत् सवि॒ता हस्त॑मग्रभीत् । पत्नी॒ त्वम॑सि॒ धर्म॑णा॒हं गृ॒हप॑ति॒स्तव॑** ॥ २ ॥

  • हे वरानने ! जैसे मैं (सौभगत्वाय) ऐश्वर्य, सुसन्तानादि सौभाग्य की बढ़ती के लिए (ते) तेरे (हस्तम्) हाथ को (गृभ्णामि) ग्रहण करता हूँ, तू (मया) मुझ (पत्या) पति के साथ (जरदष्टिः) जरावस्था को प्राप्त सुखपूर्वक (आसः) हो, तथा हे वीर ! मैं सौभाग्य की वृद्धि के लिए आपके हस्त को ग्रहण करती हूँ। आप मुझ पत्नी के साथ वृद्धावस्था पर्यन्त प्रसन्न और अनुकूल रहिये। आपको मैं और मुझको आप आज से पति-पत्नी भाव करके प्राप्त हुए हैं। (भगः) सकल ऐश्वर्ययुक्त (अर्यमा) न्यायकारी (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति का कर्त्ता (पुरन्धिः) बहुत प्रकार के जगत् का धर्त्ता परमात्मा और (देवाः) ये सब सभामण्डप में बैठे हुए विद्वान् लोग (गार्हपत्याय) गृहाश्रमकर्म के अनुष्ठान के लिए (त्वा) तुझको (मह्यम्) मुझे (अदुः) देते हैं। आज से मैं आपके हस्ते और आप मेरे हाथ बिक चुके हैं, कभी एक-दूसरे का अप्रियाचरण न करेंगे ॥ १ ॥ ** हे प्रिये ! (भगः) ऐश्वर्ययुक्त मैं (ते) तेरे (हस्तम्) हाथ को (अग्रभीत्) ग्रहण करता हूँ तथा (सविता) धर्मयुक्त मार्ग में प्रेरक मैं तेरे (हस्तम्) हाथ को (अग्रभीत्) ग्रहण कर चुका हूँ, (त्वम्) तू (धर्मणा) धर्म से मेरी (पत्नी) भार्या (असि) है और (अहम्) मैं धर्म से (तव) तेरा (गृहपतिः) गृहपति हूँ। अपने दोनों मिलके घर के कामों की सिद्धि करें, और जो दोनों का अप्रियाचरण व्यभिचार है, उसको कभी न करें, जिससे घर के सब काम सिद्ध, उत्तम सन्तान, ऐश्वर्य और सुख की बढ़ती सदा होती रहे ॥ २ ॥

विवाहप्रकरणम् १६७ ममे॒यम॑स्तु पोष्या॒ मह्यं॑ त्वादा॒द् बृह॒स्पति॑:। मया॒ पत्या॑ प्र॒जाव॑ति॒ सं जीव श॒रद॑: श॒तम्* ॥ ३ ॥ त्वष्टा॒ वासो॒ व्य॑दधाच्छु॒भे कं बृहस्पते॑: प्र॒शिषा॑ क॒वीनाम्। तेने॒मां नारीं॑ सवि॒ता भग॑श्च॒ सूर्यामि॑व॒ परि॑ धत्तां प्र॒जया॑¶ ॥ ४ ॥

  • हे अनघे! (बृहस्पति:) सब जगत् का पालन करनेहारे परमात्मा ने जिस (त्वा) तुझको (मह्यम्) मुझे (अदात्) दिया है (इयम्) यही तू जगत्भर में मेरी (पोष्या) पोषण करने योग्य पत्नी (अस्तु) हो, हे (प्रजावति) तू (मया पत्या) मुझ पति के साथ (शतम्) सौ (शरद:) शरद् ऋतु अर्थात् शतवर्ष पर्यन्त (शं जीव) सुखपूर्वक जीवन धारण कर। वैसी ही वधू भी वर से प्रतिज्ञा करावे—हे भद्रवीर! परमेश्वर की कृपा से आप मुझे प्राप्त हुए हो, मेरे लिए आपके बिना इस जगत् में दूसरा पति अर्थात् स्वामी पालन करनेहारा सेव्य, इष्टदेव कोई नहीं है, न मैं आपसे अन्य दूसरे किसी को मानूँगी, जैसे आप मेरे सिवाय दूसरी स्त्री से प्रीति न करोगे, वैसे मैं भी किसी दूसरे पुरुष के साथ प्रीतिभाव से न वर्त्ता करूँगी। आप मेरे साथ सौ वर्ष पर्यन्त आनन्द से प्राण धारण कीजिए॥ ३ ॥ हे शुभानने! जैसे (बृहस्पते:) इस परमात्मा की सृष्टि में और उसकी तथा (कवीनाम्) आप्त विद्वानों की (प्रशिषा) शिक्षा से दम्पती होते हैं, (त्वष्टा) जैसे बिजली सबको व्यास हो रही है, वैसे तू मेरी प्रसन्नता के लिए (वास:) सुन्दर वस्त्र (शुभे) और आभूषण तथा (कम्) मुझसे सुख को प्राप्त हो, इस मेरी और तेरी इच्छा को परमात्मा (व्यदधात्) सिद्ध करे। जैसे (सविता) सकल जगत् की उत्पत्ति करनेहारा परमात्मा (च) और (भग:) पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त (प्रजया) उत्तम प्रजा से (इमाम्) इस तुझ (नारीम्) मुझ नर की स्त्री को (परिधत्ताम्) आच्छादित, शोभायुक्त करे, वैसे मैं (तेन) इस सबसे (सूर्याम् इव) सूर्य की किरण के समान तुझको वस्त्र और भूषणादि से सुशोभित सदा रक्खूँगा। तथा हे प्रिय! आपको मैं इसी प्रकार सूर्य के समान सुशोभित आनन्द अनुकूल प्रियाचरण

१६८ संस्कारविधिः इन्द्राग्नी॒ द्यावा॑पृथि॒वी मा॑त॒रिश्वॉ मि॒त्रावरु॑णा॒ भगो॑ अ॒श्विनो॒भा। बृह॒स्पति॒र्म॒रुतो॒ ब्रह्म॒ सोम॑ इ॒मां नारीं॒ प्रजया॑ वर्धयन्तु॑ ॥५॥ अ॒हं वि॒ष्यामि॒ मयि॑ रू॒पम॑स्या॒ वेद॑दित् पश्य॒न्मन॑सः कुला॒यम्। न स्ते॒यम॒द्भि म॒नसोद॑मुच्ये स्व॒यं श्र॑थ्नानो वरु॑णस्य॒ पाशा॑न् ᳒ ॥६॥ करके (प्रजया) ऐश्वर्य, वस्त्राभूषण आदि से सदा आनन्दित रक्खूँगी ॥४॥

  • हे मेरे सम्बन्धी लोगो ! जैसे (इन्द्राग्नी) बिजली और प्रसिद्ध अग्नि (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि (मातरिश्वॉ) अन्तरिक्षस्थ वायु (मित्रावरुणा) प्राण और उदान तथा (भगः) ऐश्वर्य (अश्विना) सद्वैद्य और सत्योपदेशक (उभा) दोनों (बृहस्पतिः) श्रेष्ठ, न्यायकारी, बड़ी प्रजा का पालन करनेहारा राजा (मरुतः) सभ्य मनुष्य, (ब्रह्म) सबसे बड़ा परमात्मा और (सोमः) चन्द्रमा तथा सोमलतादि ओषधिगण सब प्रजा की वृद्धि और पालन करते हैं, वैसे (इमां, नारीम्) इस मेरी स्त्री को (प्रजया) प्रजा से बढ़ाया करते हैं, वैसे तुम भी (वर्धयन्तु) बढ़ाया करो। जैसे मैं इस स्त्री को प्रजा आदि से सदा बढ़ाया करूँगा, वैसे स्त्री भी प्रतिज्ञा करे कि मैं भी इस मेरे पति को सदा आनन्द, ऐश्वर्य और प्रजा से बढ़ाया करूँगी। जैसे ये दोनों मिलके प्रजा को बढ़ाया करते हैं, वैसे तू और मैं मिलके गृहाश्रम के अभ्युदय को बढ़ाया करें॥५॥ ० हे कल्याणक्रोडे! जैसे (मनसः) मन से (कुलायम्) कुल की वृद्धि को (पश्यन्) देखता हुआ (अहम्) मैं (अस्याः) इस तेरे (रूपम्) रूप को (विष्यामि) प्रीति से प्राप्त और इसमें प्रेम द्वारा व्याप्त होता हूँ, वैसे यह तू मेरी वधू (मयि) मुझमें प्रेम से व्याप्त होके अनुकूल व्यवहार को (वेदत्) प्राप्त होवे। जैसे मैं (मनसा) मन से भी इस तुझ वधू के साथ (स्तेयम्) चोरी को (उदमुच्ये)

विवाहप्रकरणम् १६९ इन पाणिग्रहण के छह मन्त्रों को बोलके, पश्चात् वर वधू की हस्ताञ्जलि पकड़के उठावे और उसको साथ लेके जो कलश कुण्ड की दक्षिण दिशा में प्रथम स्थापन किया था, उसको वही पुरुष जो कलश के पास बैठा था, वर-वधू के साथ उसी कलश को लेकर चले। यज्ञकुण्ड की दोनों प्रदक्षिणा करके— ओम् अमोऽहमस्मि सा त्वꣳ सा त्वमस्यमोऽहम्। सामाहमस्मि ऋक्त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वं तावेव विवहावहै सह रेतो दधावहै। प्रजां प्रजनयावहै पुत्रान् विन्दावहै बहून्। ते सन्तु जरदष्टयः संप्रीयौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतꣳ शृणुयाम शरदः शतम्॥ ७॥ छोड़ देता हूँ और किसी उत्तम पदार्थ का चोरी से (नाद्मि) भोज नहीं करता हूँ, (स्वयम्) आप (श्रथ्नानः) पुरुषार्थ से शिथिल होकर भी (वरुणस्य) उत्कृष्ट व्यवहार में विघ्नरूप दुर्व्यसनी पुरुष के (पाशान्) बन्धनों को दूर करता रहूँ, वैसे (इत्) ही यह वधू भी किया करे। इसी प्रकार वधू भी स्वीकार करे कि—मैं भी इसी प्रकार आपसे वर्त्ता करूँगी॥ ६॥

  • हे वधू! जैसे (अहम्) मैं (अमः) ज्ञानवान् ज्ञानपूर्वक तेरा ग्रहण करनेवाला (अस्मि) होता हूँ, वैसे (सा) सो (त्वम्) तू भी ज्ञानपूर्वक मेरा ग्रहण करनेहारी (असि) है, जैसे (अहम्) मैं अपने पूर्ण प्रेम से तुझको (अमः) ग्रहण करता हूँ, वैसे (सा) मुझसे ग्रहण की हुई (त्वम्) तू भी मुझको ग्रहण करती है। (अहम्) मैं (साम) सामवेद के तुल्य प्रशंसित (अस्मि) हूँ, हे वधू! तू (ऋक्) ऋग्वेद के तुल्य प्रशंसित है, (त्वम्) तू (पृथिवी) पृथिवी के समान गर्भादि गृहाश्रम के व्यवहारों को धारण करनेहारी है और मैं (द्यौः) वर्षा करनेहारे सूर्य के समान हूँ, वह तू और मैं (तावेव) दोनों ही (विवहावहै) प्रसन्नतापूर्वक विवाह करें, (सह) साथ मिलके (रेतः) वीर्य को (दधावहै) धारण करें, (प्रजाम्)

१७० संस्कारविधिः इन प्रतिज्ञा-मन्त्रों से दोनों प्रतिज्ञा करके— पश्चात् वर वधू के पीछे रहके, वधू के दक्षिण ओर समीप में जा उत्तराभिमुख खड़ा रहके, वधू की दक्षिणाञ्जलि अपनी दक्षिणाञ्जलि से पकड़के दोनों खड़े रहें और वह पुरुष पुनः कुण्ड के दक्षिण में कलश लेके वैसे बैठे। तत्पश्चात् वधू की माता अथवा भाई जो प्रथम चावल और ज्वार की धाणी सूप में रक्खी थी, उसको बाएँ हाथ में लेके दाहिने हाथ से वधू का दक्षिण पग उठवाके पत्थर की शिला पर चढ़वावे और उस समय वर— ओम् आरोहेममश्मानमश्मेव त्वं स्थिरा भव। अभितिष्ठ पृतन्यतोऽवबाधस्व पृतनायतः ॥ १ ॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् वधू-वर कुण्ड के समीप जाके पूर्वाभिमुख दोनों खड़े रहें और यहाँ वधू दक्षिण ओर रहके अपनी हस्ताञ्जलि को वर की हस्ताञ्जलि पर रक्खे। तत्पश्चात् वधू की माँ या भाई, जो बाएँ हाथ में धाणी का सूपड़ा पकड़के खड़ा रहा हो, वह धाणी का सूपड़ा भूमि पर धर अथवा किसी के हाथ में देके, जो वधू-वर की एकत्र की हुई, अर्थात् नीचे वर की और ऊपर वधू की हस्ताञ्जलि

उत्तम प्रजा को (प्रजनयावहै) उत्पन्न करें, (बहून्) बहुत (पुत्रान्) पुत्रों को (विन्दावहै) प्राप्त होवें। (ते) वे पुत्र (जरदष्टयः) जरावस्था के अन्त तक जीवनयुक्त (सन्तु) रहें, (संप्रियौ) अच्छे प्रकार एक- दूसरे से प्रसन्न (रोचिष्णू) एक-दूसरे में रुचियुक्त (सुमनस्यमानौ) अच्छे प्रकार विचार करते हुए (शतम्) सौ (शरदः) शरद्ऋतु अर्थात् शत वर्ष पर्यन्त एक-दूसरे को प्रेम की दृष्टि से (पश्येम) देखते रहें (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त आनन्द से (जीवेम) जीते रहें और (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त प्रिय वचनों को (शृणुयाम) सुनते रहें॥७॥

विवाहप्रकरणम् १७१ है, उसमें प्रथम थोड़ा घृत सिंचन करके, पश्चात् प्रथम सूप में से दाहिने हाथ की अञ्जलि से दो बार लेके वर-वधू की एकत्र की हुई अञ्जलि में धाणी डाले। पश्चात् उस अञ्जलिस्थ धाणी पर थोड़ा-सा घी सिंचन करे। पश्चात् वधू वर की हस्ताञ्जलिसहित अपनी हस्ताञ्जल को आगे से नमाके— ओ३म् अर्यमणं देवं कन्या अग्निमयक्षत। स नो अर्यमा देवः प्रेतो मुञ्चतु मा पतेः स्वाहा॥ इदमर्यम्णे अग्नये—इदन्न मम॥ १॥ ओ३म् इयं नार्युपब्रूते लाजानावपन्तिका। आयुष्मानस्तु मे पतिरेधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा॥ इदमग्नये—इदन्न मम॥ २॥ ओ३म् इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ समृद्धिकरणं तव। मम तुभ्यं च संवननं तदग्निरनुमन्यतामियँ स्वाहा॥ इदमग्नये—इदन्न मम॥ ३॥ इन तीन मन्त्रों में एक-एक मन्त्र से एक-एक बार थोड़ी- थोड़ी धाणी की आहुति तीन बार प्रज्वलित ईंधन पर देके, वर— ओं सरस्वति प्रेदमव सुभगे वाजिनीवति। यान्त्वा विश्वस्य भूतस्य प्रजायामस्याग्रतः यस्यां भूतँ समभवद् यस्यां विश्वमिदं जगत्। तामद्य गाथां गास्यामि या स्त्रीणामुत्तमं यशः॥ १॥ इस मन्त्र को बोलके अपने जमणे हाथ की हस्ताञ्जलि से वधू की हस्ताञ्जलि पकड़के, वर— ओं तुभ्यमग्रे पर्यवहन्त्सूर्यां वहतुना सह। पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह॥ १॥ ओं कन्यला पितृभ्यः पतिलोकं यतीयमप दीक्षामयष्ट। कन्या उत त्वया वयं धारा उदन्या इवातिगाहेमहि द्विषः॥ २॥ इन मन्त्रों को पढ़, यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, यज्ञकुण्ड

१७२ संस्कारविधिः के पश्चिमभाग में पूर्व की ओर मुख करके थोड़ी देर दोनों खड़े रहें। तत्पश्चात् पूर्वोक्त प्रकार कलशसहित यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा कर, पुनः दो बार इसी प्रकार, अर्थात् सब मिलके तीन परिक्रमा करके, अन्त में यज्ञकुण्ड के पश्चिम में थोड़ा खड़ा रहके, उक्त रीति से तीन बार क्रिया पूरी हुए पश्चात् वधू की माँ अथवा भाई उस सूप को तिरछा करके उसमें बाकी रही हुई धाणी को वधू की हस्ताञ्जलि में डाल देवे। पश्चात् वधू— ओं भगाय स्वाहा॥ इदं भगाय—इदन्न मम॥ इस मन्त्र को बोलके प्रज्वलित अग्नि पर वेदी में उस धाणी की एक आहुति देवे। पश्चात् वर-वधू को दक्षिण भाग में रखके कुण्ड के पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठके— ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इदं प्रजापतये—इदन्न मम॥ इस मन्त्र को बोलके स्रुवा से एक घृत की आहुति देवे। तत्पश्चात् एकान्त में जाके वधू के बँधे हुए केशों को वर— प्र त्वा मुञ्चामि॒ वरु॑णस्य॒ पाशा॒द्येन॒ त्वाब॑ध्नात् स॒वि॒ता सु॒शेव॑ः। ऋ॒तस्य॑ यो॒नौ सु॒कृ॒तस्य॑ लो॒केऽरि॑ष्टां त्वा स॒ह पत्या॑ दधामि॥ १ ॥ प्रेतो मु॑ञ्चामि॒ नामुतः सुब॒द्धाम॒मुत॑स्करम्। यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपु॒त्रा सु॒भगास॑ति॥ २ ॥ इन दोनों मन्त्रों को बोलके प्रथम वधू के केशों को छोड़ना। तत्पश्चात् सभामण्डप में आके ‘सप्तपदी-विधि’ का आरम्भ करे। इस समय वर के उपवस्त्र के साथ वधू के उत्तरीय वस्त्र की गाँठ देनी, इसे ‘जोड़ा’ कहते हैं। वधू-वर दोनों जने आसन पर से उठके वर अपने दक्षिण हाथ से वधू की दक्षिण हस्ताञ्जलि पकड़के यज्ञकुण्ड के उत्तरभाग में जावें। तत्पश्चात् वर अपना

विवाहप्रकरणम् १७३ दक्षिण हाथ वधू के दक्षिण स्कन्धे पर रखके दोनों समीप- समीप उत्तराभिमुख खड़े रहें। तत्पश्चात् वर— मा सव्येन दक्षिणमतिक्राम ॥ ऐसा बोलके वधू को उसका दक्षिण पग उठवाके चलने के लिए आज्ञा देवे और— ओम् इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते सन्तु जरदष्टयः ॥ इस मन्त्र को बोलके वर अपने साथ वधू को लेकर ईशान दिशा में एक पग* चले और चलावे। ओम् ऊर्जे द्विपदी भव०*॥ इस मन्त्र से दूसरा। ओं रायस्पोषाय त्रिपदी भव० ॥ इस मन्त्र से तीसरा। ओं मयोभवाय चतुष्पदी भव० ॥ इस मन्त्र से चौथा। ओं प्रजाभ्यः पञ्चपदी भव० ॥ इस मन्त्र से पाँचवाँ। ओम् ऋतुभ्यः षट्पदी भव० ॥ इस मन्त्र से छठा ॥ और— ओं सखे सप्तपदी भव० ॥ इस मन्त्र से सातवाँ पग चलना। इस रीति से इन सात मन्त्रों से सात पग ईशान दिशा में चलाके वधू-वर दोनों गाँठ बँधे हुए शुभासन पर बैठें। तत्पश्चात् प्रथम से जो जल के कलश को लेके यज्ञकुण्ड के दक्षिण में बैठाया था, वह पुरुष उस पूर्व-स्थापित जलकुम्भ

  • इस पग धरने की विधि ऐसी है कि वधू प्रथम अपना जमणा पग उठाके ईशानकोण की ओर बढ़ाके धरे, तत्पश्चात् दूसरे बायें पग को उठाके जमणे पग की पटली तक धरे, अर्थात् जमणे पग के थोड़ा-सा पीछे बायाँ पग रक्खे। इसी को एक पग गिणना। इसी प्रकार अगले छह मन्त्रों से भी क्रिया करनी, अर्थात् एक- एक मन्त्र से एक-एक पग ईशान दिशा की ओर धरना। जो 'भव' के आगे मन्त्र में पाठ है, सो छह मन्त्रों के इस 'भव' पद के आगे पूरा बोलके पग धरने की क्रिया करनी।

१७४ संस्कारविधिः को लेके वधू-वर के समीप आवे और उसमें से थोड़ा-सा जल लेके वधू-वर के मस्तक पर छिटकावे, और वर— ओम् आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ ऽ ऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥ १॥ यो व॑: शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह न॑:। उ॒श॒तीरि॑व मा॒तर॑:॥ २॥ तस्मा॒ऽ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ। आपो॑ ज॒नय॑था च नः॥ ३॥ ओम् आपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्॥ ४॥ इन चार मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात् वधू-वर वहाँ से उठके— ओं तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतꣳ शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ १॥ इस मन्त्र को पढ़के सूर्य का अवलोकन करें। तत्पश्चात् वर वधू के दक्षिण स्कन्धे पर अपना दक्षिण हाथ लेके उससे वधू का हृदय-स्पर्श करके— ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनु चित्तं ते अस्तु। मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥*

  • हे वधू! (ते) तेरे (हृदयम्) अन्तःकरण और आत्मा को (मम) मेरे (व्रते) कर्म के अनुकूल (दधामि) धारण करता हूँ (मम) मेरे (चित्तमनु) चित्त के अनुकूल (ते) तेरा (चित्तम्) चित्त सदा (अस्तु) रहे, (मम) मेरी (वाचम्) वाणी को तू (एकमनाः) एकाग्रचित्त से (जुषस्व) सेवन किया कर। (प्रजापतिः) प्रजा का पालन करनेवाला परमात्मा (त्वा) तुझको (मह्यम्) मेरे लिए (नियुनक्तु) नियुक्त करे।