संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ संस्कारविधिः के पश्चिमभाग में पूर्व की ओर मुख करके थोड़ी देर दोनों खड़े रहें। तत्पश्चात् पूर्वोक्त प्रकार कलशसहित यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा कर, पुनः दो बार इसी प्रकार, अर्थात् सब मिलके तीन परिक्रमा करके, अन्त में यज्ञकुण्ड के पश्चिम में थोड़ा खड़ा रहके, उक्त रीति से तीन बार क्रिया पूरी हुए पश्चात् वधू की माँ अथवा भाई उस सूप को तिरछा करके उसमें बाकी रही हुई धाणी को वधू की हस्ताञ्जलि में डाल देवे। पश्चात् वधू— ओं भगाय स्वाहा॥ इदं भगाय—इदन्न मम॥ इस मन्त्र को बोलके प्रज्वलित अग्नि पर वेदी में उस धाणी की एक आहुति देवे। पश्चात् वर-वधू को दक्षिण भाग में रखके कुण्ड के पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठके— ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इदं प्रजापतये—इदन्न मम॥ इस मन्त्र को बोलके स्रुवा से एक घृत की आहुति देवे। तत्पश्चात् एकान्त में जाके वधू के बँधे हुए केशों को वर— प्र त्वा मुञ्चामि॒ वरु॑णस्य॒ पाशा॒द्येन॒ त्वाब॑ध्नात् स॒वि॒ता सु॒शेव॑ः। ऋ॒तस्य॑ यो॒नौ सु॒कृ॒तस्य॑ लो॒केऽरि॑ष्टां त्वा स॒ह पत्या॑ दधामि॥ १ ॥ प्रेतो मु॑ञ्चामि॒ नामुतः सुब॒द्धाम॒मुत॑स्करम्। यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपु॒त्रा सु॒भगास॑ति॥ २ ॥ इन दोनों मन्त्रों को बोलके प्रथम वधू के केशों को छोड़ना। तत्पश्चात् सभामण्डप में आके ‘सप्तपदी-विधि’ का आरम्भ करे। इस समय वर के उपवस्त्र के साथ वधू के उत्तरीय वस्त्र की गाँठ देनी, इसे ‘जोड़ा’ कहते हैं। वधू-वर दोनों जने आसन पर से उठके वर अपने दक्षिण हाथ से वधू की दक्षिण हस्ताञ्जलि पकड़के यज्ञकुण्ड के उत्तरभाग में जावें। तत्पश्चात् वर अपना