संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरणम् १७३ दक्षिण हाथ वधू के दक्षिण स्कन्धे पर रखके दोनों समीप- समीप उत्तराभिमुख खड़े रहें। तत्पश्चात् वर— मा सव्येन दक्षिणमतिक्राम ॥ ऐसा बोलके वधू को उसका दक्षिण पग उठवाके चलने के लिए आज्ञा देवे और— ओम् इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते सन्तु जरदष्टयः ॥ इस मन्त्र को बोलके वर अपने साथ वधू को लेकर ईशान दिशा में एक पग* चले और चलावे। ओम् ऊर्जे द्विपदी भव०*॥ इस मन्त्र से दूसरा। ओं रायस्पोषाय त्रिपदी भव० ॥ इस मन्त्र से तीसरा। ओं मयोभवाय चतुष्पदी भव० ॥ इस मन्त्र से चौथा। ओं प्रजाभ्यः पञ्चपदी भव० ॥ इस मन्त्र से पाँचवाँ। ओम् ऋतुभ्यः षट्पदी भव० ॥ इस मन्त्र से छठा ॥ और— ओं सखे सप्तपदी भव० ॥ इस मन्त्र से सातवाँ पग चलना। इस रीति से इन सात मन्त्रों से सात पग ईशान दिशा में चलाके वधू-वर दोनों गाँठ बँधे हुए शुभासन पर बैठें। तत्पश्चात् प्रथम से जो जल के कलश को लेके यज्ञकुण्ड के दक्षिण में बैठाया था, वह पुरुष उस पूर्व-स्थापित जलकुम्भ
- इस पग धरने की विधि ऐसी है कि वधू प्रथम अपना जमणा पग उठाके ईशानकोण की ओर बढ़ाके धरे, तत्पश्चात् दूसरे बायें पग को उठाके जमणे पग की पटली तक धरे, अर्थात् जमणे पग के थोड़ा-सा पीछे बायाँ पग रक्खे। इसी को एक पग गिणना। इसी प्रकार अगले छह मन्त्रों से भी क्रिया करनी, अर्थात् एक- एक मन्त्र से एक-एक पग ईशान दिशा की ओर धरना। जो 'भव' के आगे मन्त्र में पाठ है, सो छह मन्त्रों के इस 'भव' पद के आगे पूरा बोलके पग धरने की क्रिया करनी।