संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ संस्कारविधिः को लेके वधू-वर के समीप आवे और उसमें से थोड़ा-सा जल लेके वधू-वर के मस्तक पर छिटकावे, और वर— ओम् आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ ऽ ऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥ १॥ यो व॑: शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह न॑:। उ॒श॒तीरि॑व मा॒तर॑:॥ २॥ तस्मा॒ऽ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ। आपो॑ ज॒नय॑था च नः॥ ३॥ ओम् आपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्॥ ४॥ इन चार मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात् वधू-वर वहाँ से उठके— ओं तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतꣳ शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ १॥ इस मन्त्र को पढ़के सूर्य का अवलोकन करें। तत्पश्चात् वर वधू के दक्षिण स्कन्धे पर अपना दक्षिण हाथ लेके उससे वधू का हृदय-स्पर्श करके— ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनु चित्तं ते अस्तु। मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥*
- हे वधू! (ते) तेरे (हृदयम्) अन्तःकरण और आत्मा को (मम) मेरे (व्रते) कर्म के अनुकूल (दधामि) धारण करता हूँ (मम) मेरे (चित्तमनु) चित्त के अनुकूल (ते) तेरा (चित्तम्) चित्त सदा (अस्तु) रहे, (मम) मेरी (वाचम्) वाणी को तू (एकमनाः) एकाग्रचित्त से (जुषस्व) सेवन किया कर। (प्रजापतिः) प्रजा का पालन करनेवाला परमात्मा (त्वा) तुझको (मह्यम्) मेरे लिए (नियुनक्तु) नियुक्त करे।