संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरणम् १७५ इस मन्त्र को बोले और उसी प्रकार वधू भी अपने दक्षिण हाथ से वर के हृदय का स्पर्श करके इसी ऊपर लिखे हुए मन्त्र को बोले*। तत्पश्चात् वर वधू के मस्तक पर हाथ धरके— सु॒म॒ङ्गली॒रियं व॒धूरि॒मां स॒मेत॒ पश्य॑त । सौभा॑ग्यमस्यै द॒त्त्वा याथास्तं॒ वि परे॑तन ॥ इस मन्त्र को बोलके कार्यार्थ आये हुए लोगों की ओर अवलोकन करना और इस समय सब लोग— ‘ओं सौभाग्यमस्तु। ओं शुभं भवतु ॥’ इस वाक्य से आशीर्वाद देवें। तत्पश्चात् वधू-वर यज्ञकुण्ड के समीप पूर्ववत् बैठके, पुनः पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे दोनों (ओं यदस्य कर्मणो०), इस स्विष्टकृत् मन्त्र से होमाहुति, अर्थात् एक आज्याहुति और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से एक-एक से एक-एक आहुति करके चार आज्याहुति देवें और इस प्रमाणे विवाह का विधि पूरे हुए पश्चात् दोनों जने आराम, अर्थात् विश्राम करें।
- वैसे ही हे प्रिय वीर स्वामिन् ! आपके हृदय, आत्मा और अन्तःकरण को मेरे प्रियाचरण कर्म में धारण करती हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल आपका चित्त सदा रहे। आप एकाग्र होके मेरी वाणी का जो कुछ मैं आपसे कहूँ उसका सेवन सदा किया कीजिए, क्योंकि आज से प्रजापति परमात्मा ने आपको मेरे अधीन किया है वैसे मुझको आपके अधीन किया है, अर्थात् इस प्रतिज्ञा के अनुकूल दोनों वर्त्ता करें, जिससे सर्वदा आनन्दित और कीर्तिमान, पतिव्रता और स्त्रीव्रत होके सब प्रकार के व्यभिचार, अप्रियभाषणादि को छोड़के परस्पर प्रीतियुक्त रहें।