भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

१७६ संस्कारविधिः इस रीति से थोड़ा-सा विश्राम करके विवाह का उत्तर- विधि करें। यह उत्तर-विधि सब वधू के घर की ईशान दिशा में, विशेष करके एक घर प्रथम से बना रक्खा हो, वहाँ जाके करना। तत्पश्चात् सूर्य अस्त हुए पीछे जब आकाश में नक्षत्र दीखें, उस समय वधू-वर यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख आसन पर बैठें और पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान (ओं भूर्भुवः स्वद्यौं०) इस मन्त्र से करें। यदि प्रथम ही सभामण्डप ईशान दिशा में हुआ और प्रथम अग्न्याधान किया हो, तो अग्न्याधान न करें। (ओम् अयन्त इध्म०) इत्यादि चार मन्त्रों से समिदाधान करके, जब अग्नि प्रदीप्त होवे तब पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से आघारावाज्यभागाहुति चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से चार व्याहृति आहुति, ये सब मिलके आठ आज्याहुति देवें। तत्पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से प्रधान-होम करें— ओं लेखासन्धिषु पक्ष्मस्वारोकेषु च यानि ते। तानि ते पूर्णाहुत्या . सर्वाणि शमयाम्यहं स्वाहा ॥ इदं कन्यायै—इदन्न मम ॥ ओं केशेषु यच्च पापकमीक्षिते रुदिते च यत्। तानि०॥ ओं शीलेषु यच्च पापकं भाषिते हसिते च यत्। तानि०॥ ओम् आरोकेषु च दन्तेषु हस्तयोः पादयोश्च यत्। तानि०॥ ओम् ऊर्वोरुपस्थे जङ्घयोः सन्धानेषु च यानि ते। तानि०॥ ओं यानि कानि च घोराणि सर्वाङ्गेषु तवाभवन्। पूर्णाहुतिभिराज्यस्य सर्वाणि तान्यशीशमं स्वाहा॥ इदं कन्यायै—इदन्न मम ॥ ये छह मन्त्र हैं। इनमें से एक-एक मन्त्र बोल, एक-एक से एक-एक आहुति, अर्थात् छह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्