संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 181, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरणम् १७७ पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार व्याहृति मन्त्रों से चार आज्याहुति देके— वधू-वर वहाँ से उठके सभामण्डप के बाहर उत्तर दिशा में जावें। तत्पश्चात् वर— ध्रुवं पश्य॥ ऐसा बोलके वधू को ध्रुव का तारा दिखलावे१ और वधू वर से बोले कि मैं— पश्यामि ॥ ध्रुव-तारे को देखती हूँ। तत्पश्चात् वधू बोले— ओं ध्रुवमसि ध्रुवाहं पतिकुले भूयासम् ( अमुष्य२ असौ ) ॥ इस मन्त्र को बोलके, तत्पश्चात्— अरुन्धतीं पश्य ॥ ऐसा वाक्य बोलके वर वधू को अरुन्धती का तारा दिखलावे और वधू— पश्यामि ॥ ऐसा कहके— १. हे वधू वा वर ! जैसे यह ध्रुव दृढ़ स्थिर है, इसी प्रकार आप और मैं एक-दूसरे के प्रियाचरणों में दृढ़ स्थिर रहें। २. (अमुष्य) इस पद के स्थान में षष्ठीविभक्त्यन्त पति का नाम बोलना, जैसे—शिवशर्मा पति का नाम हो तो ‘‘शिवशर्मणः’’ ऐसे, और (असौ) इस पद के स्थान में वधू अपने नाम को प्रथमा- विभक्त्यन्त बोलकर इस मन्त्र को पूरा बोले जैसे ‘‘भूयासं सौभाग्यदाहम् शिवशर्मणस्ते’’ इस प्रकार दोनों पद जोड़के बोले। ‘‘हे स्वामिन्! सौभाग्यदा (अहम्) मैं (अमुष्य) आप शिवशर्मा की अर्द्धांगी (पतिकुले) आपके कुल में (ध्रुव) निश्चल जैसेकि आप ( ध्रुवम् ) दृढ़ निश्चयवाले मेरे स्थिर पति (असि) हैं, वैसे मैं भी आपकी स्थिर दृढ़ पत्नी (भूयासम्) होऊँ।