भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

विवाहप्रकरणम् १७१ है, उसमें प्रथम थोड़ा घृत सिंचन करके, पश्चात् प्रथम सूप में से दाहिने हाथ की अञ्जलि से दो बार लेके वर-वधू की एकत्र की हुई अञ्जलि में धाणी डाले। पश्चात् उस अञ्जलिस्थ धाणी पर थोड़ा-सा घी सिंचन करे। पश्चात् वधू वर की हस्ताञ्जलिसहित अपनी हस्ताञ्जल को आगे से नमाके— ओ३म् अर्यमणं देवं कन्या अग्निमयक्षत। स नो अर्यमा देवः प्रेतो मुञ्चतु मा पतेः स्वाहा॥ इदमर्यम्णे अग्नये—इदन्न मम॥ १॥ ओ३म् इयं नार्युपब्रूते लाजानावपन्तिका। आयुष्मानस्तु मे पतिरेधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा॥ इदमग्नये—इदन्न मम॥ २॥ ओ३म् इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ समृद्धिकरणं तव। मम तुभ्यं च संवननं तदग्निरनुमन्यतामियँ स्वाहा॥ इदमग्नये—इदन्न मम॥ ३॥ इन तीन मन्त्रों में एक-एक मन्त्र से एक-एक बार थोड़ी- थोड़ी धाणी की आहुति तीन बार प्रज्वलित ईंधन पर देके, वर— ओं सरस्वति प्रेदमव सुभगे वाजिनीवति। यान्त्वा विश्वस्य भूतस्य प्रजायामस्याग्रतः यस्यां भूतँ समभवद् यस्यां विश्वमिदं जगत्। तामद्य गाथां गास्यामि या स्त्रीणामुत्तमं यशः॥ १॥ इस मन्त्र को बोलके अपने जमणे हाथ की हस्ताञ्जलि से वधू की हस्ताञ्जलि पकड़के, वर— ओं तुभ्यमग्रे पर्यवहन्त्सूर्यां वहतुना सह। पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह॥ १॥ ओं कन्यला पितृभ्यः पतिलोकं यतीयमप दीक्षामयष्ट। कन्या उत त्वया वयं धारा उदन्या इवातिगाहेमहि द्विषः॥ २॥ इन मन्त्रों को पढ़, यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, यज्ञकुण्ड