संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
DevanagariHindipublished318 पृष्ठ
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१७० संस्कारविधिः इन प्रतिज्ञा-मन्त्रों से दोनों प्रतिज्ञा करके— पश्चात् वर वधू के पीछे रहके, वधू के दक्षिण ओर समीप में जा उत्तराभिमुख खड़ा रहके, वधू की दक्षिणाञ्जलि अपनी दक्षिणाञ्जलि से पकड़के दोनों खड़े रहें और वह पुरुष पुनः कुण्ड के दक्षिण में कलश लेके वैसे बैठे। तत्पश्चात् वधू की माता अथवा भाई जो प्रथम चावल और ज्वार की धाणी सूप में रक्खी थी, उसको बाएँ हाथ में लेके दाहिने हाथ से वधू का दक्षिण पग उठवाके पत्थर की शिला पर चढ़वावे और उस समय वर— ओम् आरोहेममश्मानमश्मेव त्वं स्थिरा भव। अभितिष्ठ पृतन्यतोऽवबाधस्व पृतनायतः ॥ १ ॥ इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात् वधू-वर कुण्ड के समीप जाके पूर्वाभिमुख दोनों खड़े रहें और यहाँ वधू दक्षिण ओर रहके अपनी हस्ताञ्जलि को वर की हस्ताञ्जलि पर रक्खे। तत्पश्चात् वधू की माँ या भाई, जो बाएँ हाथ में धाणी का सूपड़ा पकड़के खड़ा रहा हो, वह धाणी का सूपड़ा भूमि पर धर अथवा किसी के हाथ में देके, जो वधू-वर की एकत्र की हुई, अर्थात् नीचे वर की और ऊपर वधू की हस्ताञ्जलि
उत्तम प्रजा को (प्रजनयावहै) उत्पन्न करें, (बहून्) बहुत (पुत्रान्) पुत्रों को (विन्दावहै) प्राप्त होवें। (ते) वे पुत्र (जरदष्टयः) जरावस्था के अन्त तक जीवनयुक्त (सन्तु) रहें, (संप्रियौ) अच्छे प्रकार एक- दूसरे से प्रसन्न (रोचिष्णू) एक-दूसरे में रुचियुक्त (सुमनस्यमानौ) अच्छे प्रकार विचार करते हुए (शतम्) सौ (शरदः) शरद्ऋतु अर्थात् शत वर्ष पर्यन्त एक-दूसरे को प्रेम की दृष्टि से (पश्येम) देखते रहें (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त आनन्द से (जीवेम) जीते रहें और (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त प्रिय वचनों को (शृणुयाम) सुनते रहें॥७॥